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नज़्म
नग़्मा-ए-देहली
मीनार वो मीनारा-ए-अज़मत जिसे कहिए
मस्जिद वो कि सज्दा-गह-ए-फ़ितरत जिसे कहिए
रिफ़अत सरोश
ग़ज़ल
शैख़ की मस्जिद से ऐ 'बेदार' क्या है तुझ को काम
सज्दा-गह अपना सनम के आस्ताँ का संग है
मीर मोहम्मदी बेदार
नज़्म
एक रह-गुज़र पर
ग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र है
नियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मयस्सर है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
तिरे हर नक़्श-ए-पा को रहगुज़र में सज्दा-गह समझे
जहाँ तू ने क़दम रक्खा वहाँ मैं ने भी सर रक्खा
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
तिरा जल्वा मेरी शराब है मिरी सज्दा-गह तिरा आस्ताँ
न तलब मुझे मय-ओ-जाम की न दर-ए-मुग़ाँ की तलाश है