aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ओहदे"
ओहदुद्दीन ओहदी
लेखक
ख़ैर मोहम्मद ओहदी
अनुवादक
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थेबहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
चारों तरफ़ ख़यानत, ग़बन और तहरीस का बाज़ार गर्म था। पटवार-गिरी का मुअज़्ज़ज़ और पुर-मुनफ़अत ओहदा छोड़-छोड़ कर लोग सीग़ा-ए-नमक की बर्क़-अन्दाज़ी करते थे। और इस महकमे का दारोग़ा वकीलों के लिए भी रश्क का बाइस था। ये वो ज़माना था। जब अंग्रेज़ी ता'लीम और ईसाइयत मुतरादिफ़ अल्फ़ाज़ थे। फ़ारसी...
आप कहीं ये न समझ लें कि ख़ुदा-नख़्वास्ता वो कोई ऐसे आदमी हैं जिनका ज़िक्र किसी मुअज़्ज़ मज्मे में ना किया जा सके। कुछ अपने हुनर के तुफ़ैल और कुछ ख़ाकसार की सोहबत की बदौलत सब के सब ही सफेदपोश हैं। लेकिन इस बात को क्या करूँ कि उनकी दोस्ती...
यहां ये रस्म मम्नू है।बच्चों के लीए भी मिठाई, खिलौने, बाजे, बिगुल, शायद अपनी ज़िंदगी में एक बार भी न लाए हूँ। क़सम ही खा ली है। इसलीए मै तो उन्हें बख़ील कहूँगी, बदशौक़ कहूँगी, मुर्दा दिल कहूँगी, फ़य्याज़ नहीं कह सकती। दूसरों के साथ इन का जो फ़याज़ाना सुलूक...
'ओहदेعُہْدے
पद, मर्तबा, शासन
'ओह्देعُہْدہ
'ओहदे से निकलनाعُہْدے سے نِکَلْنا
ओहदा-बुरा होना
'ओहदे से बाहर आनाعُہْدے سے باہَر آنا
किसी काम की ज़िम्मेदारी को पूरा करके उससे मुक्त होना, किसी फ़र्ज़ से मुक्ति हासिल करना
जिद्द-ओ-जह्द-ए-अाज़ादी में मज्लिस-ए-क़ानून साज़ का रोल
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
भारत का इतिहास
जिद्द-ओ-जहद-ए-आज़ादी
अन्य
Kimiya-e-Hikmat
ओहदा-ए-नाज़िम क़ुतुब ख़ानादारी
के सी हरीसन
कैटलॉग / सूची
Masnavi Jam-e-Jam
लेडी हार्डिंग और सेंट स्टीफ़न कॉलेज... चेम्सफ़ोर्ड क्लब रौशन-आरा, इम्पिरियल जिम-ख़ाना ग़रज़ कि हर तरफ़ अलिफ़-लैला के बाब बिखरे पड़े थे। हर जगह नौजवान फ़ौजी अफ़सरों और सिविल सर्विस के बिन ब्याहे ओ’हदे-दारों के परे डोलते नज़र आते। एक हंगामा था। प्रभा और सरला के हमराह एक रोज़ में दिलजीत...
बी.ए. पास करने के बाद चन्द्र प्रकाश को क ट्यूशन करने के सिवा कुछ न सूझा। उनकी माँ पहले ही मर चुकी थी। उसी साल वालिद भी चल बसे, और प्रकाश ज़िंदगी के जो शीरीं ख़्वाब देखा करता था, वो मिट्टी में मिल गये, वालिद आ’ला ओह्दे पर थे। उनकी...
ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सकागर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ
पड़ते थे और अपनी आज़ादी से हाथ धो बैठे थे। मैं कहता था कि इस से बढ़कर भी कोई ग़लती नहीं हो सकती कि जान-बूझ कर इन्सान अपने पांव में बेड़ियाँ डाल ले, क्या मालूम था कि थोड़े दिनों बाद लोग मुझ पर हँसेंगे। जो शिफ़ाख़ाने मेरी ज़ेरे निगरानी थे...
रूप कुमारी के बदन में आग सी लग गई। ओफ़्फ़ोह रे दिमाग़। गोया उसका शौहर लाट ही तो है। अकड़कर बोली, "तरक़्क़ी क्यों नहीं हुई। अब सौ के ग्रेड में हैं। आजकल ये भी ग़नीमत है। मैं तो अच्छे अच्छे एम.ए. पासों को देखती हूँ कि कोई टके को नहीं...
जब मेम साहब हिंदुस्तान आया करती थी। जब भी सक्खू बाई बड़ी फ़राख़-दिली से इवज़ी छोड़कर फिर नैनी के साथ नीचे काम करने लगती। उसे मेम साहब से क़त’ई कोई हसद नहीं था। मेमसाहब मग़रिबी हुस्न का नमूना हो तो हो। हिन्दुस्तानी मेयार-ए-हुस्न के तराज़ू में उसे तौला जाता तो...
डायस पर बहुत से हज़रात बेचैनी और इज़तिराब महसूस करने लगे... बेगम मर्ज़बान मसरूर थीं। मुक़र्रिर ने अपना गला साफ़ किया, फिर कहना शुरू किया, “तमाम महकमों में ऊपर से लेकर नीचे तक रिश्वत सतानी का सिलसिला क़ायम है। ये किसे मालूम नहीं? क्या ये कभी कोई राज़ है जिस...
फ़ोटोग्राफ़र मुद्दतों से यहाँ मौजूद है, न जाने और कहीं जाकर अपनी दूकान क्यों नहीं सजाता। लेकिन वो इसी क़स्बे का बाशिंदा है। अपनी झील और अपनी पाड़ी छोड़कर कहाँ जाए। इस फाटक की पुलिया पर बैठे-बैठे उसने बदलती दुनिया के रंगा-रंग तमाशे देखे हैं। पहले यहाँ साहिब लोग आते...
ग़ालिबन 1892 ई. या 93 ई. का ज़िक्र है जब मैं मदरसतुल-उलूम मुसलमानान-ए-अलीगढ़ में तालिब इल्म था। मौलाना हाली उस ज़माने में यूनियन की पास की बनगलिया में मुक़ीम थे। मैं उस साल तातीलों के ज़माने में वतन नहीं गया था तो बोर्डिंग हाउस ही में रहा। अक्सर मग़रिब के...
मैगी एलियट 80 बरस की पुर-वक़ार ख़ातून हैं, बड़े क़ाएदे और क़रीने से सजती हैं। या'नी अपनी उम्र, अपना रुत्बा, अपना माहौल देखकर सजती हैं। लबों पर हल्की सी लिपस्टिक, बालों में धीमी सी ख़ुश्बू, रुख़्सारों पर रूज़ का शाइबा सा, इतना हल्का कि गालों पर रंग मा'लूम न हो,...
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