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ग़ज़ल
मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन
अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना
मेराज फ़ैज़ाबादी
नज़्म
परछाइयाँ
हमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिए
हमारे ख़ून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी
साहिर लुधियानवी
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संग्रह
नई नस्ल के शायर
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शेर
आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फ़िराक़' को देखा है
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
हिण्डोला
इसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लें
पले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चे
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
विर्सा
ये वतन तेरी मिरी नस्ल की जागीर नहीं
सैंकड़ों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है इसे
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
तू देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे
हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी