ग़ालिब के घर में एक शाम

मोहम्मद दीन तासीर

ग़ालिब के घर में एक शाम

मोहम्मद दीन तासीर

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    तारीख़: शब-ए-क़द्र और दीवाली का दिन। क़ब्ल ग़दर दिल्ली में, 1800 ई. 
    वक़्त: माबैन अस्र-ओ-मग़रिब। साया ढल रहा है। 

    किरदार:

    1-मीरज़ा ग़ालिब 
    ‎2- बेगम ग़ालिब 

    (एक मर्दाना कमरा। दीवारों पर ताज़ा सफ़ेदी फिरी हुई, बोसीदा ईरानी क़ालीन जिस पर ‎चीते की खाल का एक टुकड़ा पड़ा हुआ है। तीन तकिए इधर उधर पड़े हुए एक पर ‎कुलाह-ए-पपाख़, एक के पास जाम-ए-सिफ़ाल, एक पर औंधी मीनाए मय। पास ही एक ‎शम्मा ख़ामोश और एक चौसर की बिसात बिछी हुई है, दाएं तरफ़ बाहर का एक ‎दरवाज़ा, कुंडी लगी हुई। वस्त में एक मुक़फ़्फ़ल दरवाज़ा, क़ुफ्ल अबजद वाला, बाएं ‎जानिब एक अफ़्सुर्दा गुलख़न, आधी जली हुई लकड़ियों से भरा हुआ, ऐन छत के क़रीब ‎जाले से ढंपा हुआ रौज़न।) 
    ‎ 
    पर्दा उठने पर मीरज़ा ग़ालिब तन्हा खुला हुआ क़बा पहने इधर उधर टहलते नज़र आते ‎हैं, कुछ गुनगुना रहे हैं। कभी क़लम से काग़ज़ पर कुछ लिख देते हैं। 
    ‎ 
    मीरज़ा ग़ालिब: हफ़्त औरंग, ऐ जहाँदार-ए-आफ़ताब-ए-आसार... आफ़ताब-ए-आसार, ‎इन्क़िलाब-ए-आसार। आफ़ताब को क़ाफ़िया करदूं, बादशाह को ऐसी ही ज़मीन पसंद ‎आती है। इन “लैला आश्ना” और “बेपर्वा नमक” वाली ग़ज़लों पर बहुत ख़ुश हुए थे, ‎जभी वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया, मगर ये कुछ इस बदज़ौक़ का अंदाज़ा हो जाता है और ‎फिर ख़्वाह-मख़्वाह की दिमाग़ सोज़ी। “आसार” ठीक है। “अफ़्गार” और “फ़िगार” दोनों ‎तरह के क़ाफ़िए बंध सकेंगे। हाँ तो, “था मैं इक दर्द मंद सीना-फ़िगार” ठीक! “था मैं इक ‎बे नवाए गोशा नशीं” और “था मैं अफ़्सुर्दा दिल शिकस्ता... मगर ये मेरा अपना मर्सिया ‎नहीं उनका क़सीदा है, सीना फ़िगार ही काफ़ी है तो फिर क्या हुआ मुझे? “हो गई मेरी ‎गर्मी-ए-बाज़ार” हाँ, “तुमने जो मुझको आबरू बख़्शी, हो गई मेरी गर्मी-ए-बाज़ार” बड़ी। 
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    मोमिन ख़ां को फ़िक़रा कसने का मौक़ा मिल गया और तो कुछ न हुआ, कहता था, ‎‎“अब तुम वज़ीफ़ा-ख़्वार हो दो शाह को दुआ।” लेकिन उसकी तअल्लियों से क्या होता ‎है। आप तो रमल फ़ाल से पैसे कमा लेता है, गो ढोंग तबाबत का रचा रखा है। ख़ैर ‎मुझे मिसरा हाथ आ गया। मक़ता नहीं बनता था, न जाने ये मक़ता क्यों ज़रूरी है। ‎मुशायरे की ग़ज़लों में कहना ही पड़ता है। अच्छा भला हो गया था, “ग़ालिब वज़ीफ़ा-‎ख़्वार हो दो शाह को...” वो दिन गए कि “कहते थे नौकर नहीं हूँ में।” जैसे मुशायरे ‎वैसी ग़ज़लें, अजीब अजीब शे’रों पर दाद मिलती, “ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं ‎हूँ।” हाय, “आख़िर गुनहगार हूँ काफ़िर नहीं हूँ मैं।” इस पर बस मोमिन और मुफ़्ती ‎साहिब (यानी आज़ुर्दा) को जुंबिश हुई बाक़ी तो वो ख़ाक बने रहे। 
    ‎ 
    ये भी ज़िला जगत हो गई। कम्बख़्त दरबारियों की सोहबत मेरा मज़ाक़ बिगाड़ रही है, ‎क़सीदे भी लिखने पड़े। अभी तीन शे’र ही हुए हैं और ये मिसरा “हो गई मेरी...” कुछ ‎सुस्त सा है, क़तआ क्यों न कर डालूं। “हुई मेरी वो गर्मी-ए-बाज़ार” ठीक, “कि हुआ मुझ ‎सा ज़र्रा-ए-नाचीज़” क्या हुआ? ज़र्रा को आफ़ताब बनाना पड़ेगा जभी समझेंगे। हाँ..., ‎‎“मुझसा ज़र्रा-ए-नाचीज़।” क्या हो गया? मतला अल अनवार...? क़ाफ़िया तो ख़ूब है: रू-‎कश मेहर मतला-ए-अलानवार? बेमानी मालूम होगा उन्हें। पहले ही मोहमलगो कहने ‎लगते हैं... है आफ़ताब सवाबित सय्यारा? नहीं, नहीं, रूशनास-ए-सवाबित सय्यारा, ये ‎ठीक है। लेकिन ये फिर मेरा अपना क़सीदा होजाता है। 
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    उस कम्बख़्त को कान भरने का मौक़ा मिल जाएगा। क्या करूँ, नाहक़ दरबारी बन ‎गया। उसके लिए तो बाइस-ए-आबरू था ये ओह्दा। उस दिन चोट समझा नहीं: “बना है ‎शह का मुसाहिब फिरे है इतराता।” मक़ता काम आगया। सब हंस रहे थे और वो हैरान ‎था... हाँ... तो: “बादशाह का ग़ुलाम कारगुज़ार।” ये ठीक रहेगा। इसमें अपनी कारगुज़ारी ‎भी आ गई... मुसलसल कर डालूं इसे। एक, दो, तीन। ठीक तीनों बैठ गए हैं, गरचे ‎अज़रूए नंग बेहुनरी हूँ ख़ुद अपनी नज़र में इतना ख़्वार, अगर अपने को मैं कहूं ख़ाकी, ‎जानता हूँ कि आए ख़ाक को आर। शाद हूँ लेकिन अपने जी में कि हूं, बादशह का ‎ग़ुलाम कारगुज़ार। बादशाह सलामत को मार्फ़त का भी दावा है। बेचारा सूफ़ी मिज़ाज है। ‎इस दिन: “असल-ए-शुहूद-ओ-शाहिद-ओ-मशहूद एक है” पर ख़ासी दाद दी थी। 
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    उस दिन से कभी कभी ग़ज़ल में एक-आध तसव्वुफ़ का शे’र जोड़ना ही पड़ जाता है, ‎पीर-ओ-मुर्शिद जो हुए: ख़ानाज़ाद और मुरीद और... ख़ुदा जाने क्या? मुरीद और नौकर? ‎नहीं नौकरी का अलग ज़िक्र चाहिए। उस मक़ता पर कहा गया था कि: “वो दिन गए कि ‎कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं” में रऊनत पाई जाती है, गोया मतासन हूँ, और हूँ भी... हाँ ‎तो: ख़ानाज़ाद और मुरीद और... मद्दाह था हमेशा से ये... क्या था मैं पहले? सवानिह ‎निगार था मगर ये लफ़्ज़ बैठता नहीं तो फिर क्या हो?... हाँ, “अरीज़ा निगार” “था ‎हमेशा से ये अरीज़ा निगार।” ठीक! “ख़ानाज़ाद और मुरीद और मद्दाह, था हमेशा से ये ‎अरीज़ा निगार” और बारे नौकर भी हो गया... सद हैफ़! सच तो यही है मगर...  
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    ‎(मुक़फ़्फ़ल दरवाज़े पर ज़नाना दस्तक होती है) 
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    खोलता हूँ, खोलता हूँ, सब्र करो, क्या हर्फ़ थे। क़ुफ्ल अबजद लगा हुआ है। तुम्हारी ही ‎पसंद है, सब्र करो (बड़ी मुश्किल से हुरूफ़ जोड़ कर खोलते हैं और बेगम साहिबा नाक ‎पर रूमाल रखे दाख़िल होती हैं।) 
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    बेगम: ये दरवाज़े बंद करके क्या कर रहे थे? बारे आज ख़लवत है। मीना ख़ाली जो है ‎‎(नाक से रूमाल हटाकर) मगर बदबू बदस्तूर आरही है। सारा कमरा मुतअफ़्फ़िन है। 

    मीरज़ा: काम कर रहा हूँ, अब ये पुरानी बहस अज़सर-ए-नौ शुरू करने से क्या हासिल, ‎मेरे खाने पीने के बर्तन तो अलग कर रखे हैं तुमने।
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    बेगम: तुमने वो बर्तन भी तो बेच डाले, अब मिट्टी के आबखू़रों पर जाम-ए-जम के ‎तसव्वुर में ख़ुश हो रहे हो, न जाने तुम्हारी फ़ाका शिकनी क्या रंग लाएगी। मगर ‎अच्छा हुआ वो सारा शैतानी कारख़ाना भी साथ ही बर्बाद हो गया। शराब सबको ले डूबी। ‎आख़िर तुम्हें ऐसी बदबूदार चीज़ से इतनी मुहब्बत क्यों है?‎
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    मीरज़ा: (मुस्कराकर) तुम जैसी नकीरैन को भगाने के लिए, कहा जो है काम कर रहा ‎हूँ। मतलब की बात कहो।
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    बेगम: काम? क्यों काम का नाम बदनाम कर रहे हो। क्या काम था। 

    मीरज़ा: काम का नाम बदनाम माशा अल्लाह मुक़फ़्फ़ा इबारत बोलने लगी हो। आख़िर ‎शायर की बीवी ठेरीं।
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    बेगम: तुम शे’र भी तो काम के नहीं कहते। 

    मीरज़ा: (बिगड़ कर) क्या हुआ मेरे शे’रों को?‎
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    बेगम: यही तो मैं पूछती हूँ। न जाने क्या हुआ है उनको। आग़ा ऐश की बीवी कहती थी ‎किसी की समझ में ही नहीं आते। 

    मीरज़ा: समझ हो तो आएं, मगर तुम अच्छी बीवी हो, दुश्मनों की हाँ मैं हाँ मिलाती ‎हो।

    बेगम: सच बोलती हूँ झूट की आदत नहीं मुझे, तुम्हारा ही कहा किया है। 

    मीरज़ा: (मुस्कुराकर) बारे मेरे शे’र तो याद होने लगे तुम्हें। आहिस्ता-आहिस्ता समझने ‎भी लगोगी।
    ‎ 
    बेगम: तुमने कुछ-कुछ मेरी ज़बान सीखनी शुरू की है तो सुलझ गए हो वर्ना वो आग़ाई ‎उर्दू किसे याद हो सकती है, नाख़ुन तैश-ए-मिज़्राब नहीं, न जाने क्या था, हकीम ऐश ‎की बीवी कुछ सुना रही थी। 

    मीरज़ा: (बिगड़ कर) क्या बेहूदगी है। मेरा शे’र कब है ये, सब उसी बेगमाती आग़ा की ‎तोहमत तराशी है। चाहते हैं मैं भी ज़नानी बोली लिखा करूँ। हम आबाई सुलह बंद ठेरे ‎‎(तन कर) सौ साल से है पेश-ए-आबा सिपहगरी, कुछ... ‎
    ‎ 
    बेगम: (बीच में बात काट कर) सच कहते हो। वाक़ई ये तुम्हारी किस्म की शायरी ‎ज़रिया-ए-इज़्ज़त नहीं हो सकती। इसमें तुमसे वो हज्जाम का लड़का ही अच्छा रहा ‎ख़ाक़ानी-ए-हिंद, मलकुश्शुअरा, न जाने क्या-क्या कुछ कहलाया। काश, तुम बुज़ुर्गों की ‎तरह सुलह बंद ही रहते। ये शे’र गोई क्यों शुरू की। बुज़ुर्गों का नाम डुबोना ही था तो ‎कोई और काम करते, जिससे कुछ आमद होती। 
    ‎ 
    मीरज़ा: काम तो कर रहा था। तुम यूंही तज़ी-ए-औक़ात कर रही हो। 

    बेगम: ख़ाक काम कर रहे थे। क्या काम था जो ताले चढ़ा कर यूं जुते हुए थे?‎
    ‎ 
    मीरज़ा: अब तुम्हें तो जब तक कोई घास खोदता नज़र न आए, काम मालूम नहीं ‎होता। क़सीदा लिख रहा हूँ। बादशाह सलामत का और आज रात दरबार में हाज़िरी है, ‎सुनाना है। 

    बेगम: घास खोद सकते तो यूं दरोदीवार पर सब्ज़ा तो न उग रहा होता, घर सहरा ‎मालूम होता है। इतना सब्ज़ा है कि बाज़ार में बेचने से रात की रोटी का सामान ‎आजाता। इसी लिए आई थी। न लकड़ी है न कोयला, आराम के अस्बाब तो क्या ‎सामान खूर्द-ओ-नोश भी नहीं, महीने भर से रोज़ कहती हूँ ख़त्म हो गया, मगर तुम हर ‎बार मज़ाक़ में टाल देते हो।
    ‎ 
    मीरज़ा: महीना भर से रोज़ कहती हो और ख़त्म आज हुआ है। तुम औरतों की किसी ‎बात का एतबार क्या हो, और फिर मैं क्या करूँ, मामा को पैसे दो, मंगवा लो। 

    बेगम: पैसे दो, मंगवा लो, पैसे कहां से दूं? चील के घोंसले में मास कहां? मर्दों की छः ‎माही की तरह तनख़्वाह मिलती है तुम्हें, एक तिहाई साहूकार के नज़र होजाती है, कुछ ‎शराब-ओ-कबाब में उड़ा डालते हो। जायदाद पहले ही से रहन है। ख़ुदा जाने तुम शराब ‎क्यों पीते हो? ख़ुदा और रसूल का ख़्याल नहीं तो जेब ही का फ़िक्र होता। शराब की ‎मुहब्बत है तो अगले जहां में महरूमी के ख़ौफ़ ही से तो रुक जाओ। 
    ‎ 
    मीरज़ा: वहां मिलती रहेगी, फ़िक्र न करो। तुम्हें आदत नहीं है, तुम अपना ख़्याल करो। ‎अच्छू पे अच्छू आएँगे, हमारा क्या है, साक़ी-ए-कौसर की बख़्शिश पर सहारा है, और ‎यहां तो तुम्हारे रवय्ये को बर्दाश्त करने और भुलाने की ख़ातिर पीता हूँ। कल बीमार ‎था, अकेला पड़ा सड़ा किया, तुम्हें इतनी तौफ़ीक़ न हुई कि पूछ लेतीं, शराब न पियूँ तो ‎और क्या करूँ?‎
    ‎ 
    बेगम: बीमार? ज़्यादा पी ली थी और क्या और फिर तुमने ख़ुद ही तो कह रखा है,
     
    ‎“पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार।” मैंने तुम्हारा कहा कर देखा। 

    मीरज़ा: साथ “हम सुख़न कोई न हो और हम ज़बां कोई न हो” की शर्त भी तो थी। इस ‎रोज़ की चिड़चिड़ से तंग आकर लिखा था। भला इस तू तू मैं मैं में क्या काम हो सके, ‎और रुपया कहां से आये।
    ‎ 
    बेगम: तो क्या रुपया कमाने का काम कर रहे थे? क्या था वो काम? 

    मीरज़ा: क़सीदा लिख रहा था बाशाह सलामत का।
    ‎ 
    बेगम: तुम रुपया कमाने का ज़िक्र कर रहे थे, उन क़सीदों में क्या रखा है, पहले लिख ‎कर क्या मिला? सड़ी हुई मूंग की दाल, अकड़ी हुई बेसनी रोटी, सेम के बीज, जो अब ‎दावे बांध रहे हो। यही ग़नीमत है साल में चंद ठीकरियाँ मिल जाती हैं जैसा काम वैसे ‎दाम। ख़ुदा जाने ये सिलसिला भी किस तरह क़ायम है। तुम्हारे शे’र भी तो इसी क़िस्म ‎के होते हैं। 
    ‎ 
    मीरज़ा: देखो, मज़ाक़ की हद होती है। मैंने तुम्हें नमाज़ पर कुछ हंसी मज़ाक़ में कहा ‎था तो तुम मैके चले जाने की धमकियां देने लगी थीं। मेरे शे’रों के मुताल्लिक़ ये ‎अंदाज़-ए-गुफ़्तगु जारी रखा तो फिर मैं भी खोटे हथियारों पर उतर आऊँगा। 

     

    बेगम: लेकिन नमाज़ तो फ़र्मुद-ए-ख़ुदा है तुम्हारे शे’रों से क्या निस्बत?‎
    ‎ 
    मीरज़ा: मेरे शे’र भी तो नवा-ए-सरोश हैं, ग़ैब से मज़ामीन आते हैं, 

    ग़ालिब अगर ईं फ़न-ए-सुख़न दीन बूदे 
    आँ दीन रा एज़दी किताब एन बूदे 

    बेगम: ठीक, ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने। ग़ैब ही से मज़ामीन आते होंगे जो मअनी यूं ‎ग़ायब रहते हैं और ज़बान तो वाक़ई ऊपर वाली है। इस ज़मीन पर बसने वाले तो नहीं ‎बोलते, कम अज़ कम दिल्ली में तो नहीं बोलते हैं।
    ‎ 
    मीरज़ा: दिल्ली दिल्ली, दिल्ली को मैं क्या जानता हूँ? ख़ुद उर्दू की क्या हैसियत है? मेरे ‎मआनी आनेवाली नसलें समझेंगी। 

    बेगम: सही होगा, मगर रोटी तो आज चाहिए। आने वाली नसलें ख़ुदा जाने कब आएं। ‎क़सीदा तो बहादुर शाह, दिल्ली के बादशाह को सुनाना है।
    ‎ 
    मीरज़ा: और ऐसा लिख रहा हूँ कि बादशाह सुनकर फड़क जाये। सुनो कैसे पुरज़ोर ‎अशआर हैं, 

    ऐ शहनशाह-ए-आसमां औरंग 
    ऐ जहाँदार-ए-आफ़ताब-ए-आसार 

    था... 

    बेगम: (टोक कर) ये पहला शे’र है क्या? मतला कहां है? 

    मीरज़ा: मतला मक़ता क्या होता है, तुम शे’र सुनो; 

    ऐ शंहशाह... 

    था मैं इक बे नवाए गोशा नशीं 
    था मैं इक दर्दमंद सीना फ़िगार 
    ‎ 
    तुमने मुझको जो आबरू बख़्शी 
    हुई मेरी वो गर्मी-ए-बाज़ार 
    ‎ 
    कि हुआ मुझसा ज़र्रा-ए-नाचीज़ 
    रूशनास-ए-सवाबित-ओ-सय्यार 
    ‎ 
    गरचे अज़रूए नंग-ए-बेहुनरी 
    हूँ ख़ुद अपनी नज़र में इतना ख़्वार 
    ‎ 
    कि गर अपने को मैं कहूं ख़ाकी 
    जानता हूँ कि आए ख़ाक को आर 
    ‎ 
    शाद हूँ अपने जी में कि हूँ 
    बादशह का ग़ुलाम-ए-कारगुज़ार 
    ‎ 
    ख़ानाज़ाद और मुरीद और मद्दाह 
    था हमेशा से ये अरीज़ा निगार 
    ‎ 
    बारे नौकर भी हो गया सद-शुक्र 
    निस्बतें हो गईं मुशख़्ख़स चार 
    ‎ 
    बेगम: इसमें आधी फ़ारसी है और काम की बात नदारद। ये दास्तान-ए-माज़ी है, आज ‎की हालत बयान करो। मगर तुम्हें सीधा साफ़ लिखना ही नहीं आता। मैं ये था और मैं ‎वो था, अब क्या हो ये कहो। लेकिन अब वक़्त कम है और ऐसी मुश्किल ज़बान में ‎लिखना कोह-ए-कुन्दन के बराबर है। 

    मीरज़ा: कोह-ए-कुन्दन क्या। लिखना क्यों नहीं आता। मैं क्या हूँ, ये लिखूँ। लो अभी ‎लो। (फ़िललबदीह कहने लगते हैं) 

    आज मुझसा नहीं ज़माने में 
    शायर नग़ज़ गो-ए-ख़ुश गुफ़्तार 
    ‎ 
    रज़्म की दास्तान गर सुनिए 
    है ज़बां मेरी तेग़-ए-जौहरदार 
    ‎ 
    बज़्म का इल्तिज़ाम गर कीजे 
    है क़लम मेरा अब्र-ए-गौहर बार 
    ‎ 
    बेगम: (टोक कर) ये अपना क़सीदा कह रहे हो कि बादशाह का, मतलब की बात कहो, ‎साफ़ साफ़ कहो तनख़्वाह माहवार चाहिए, ऊपर सर्दियां आरही हैं, कपड़े नहीं हैं, आख़िर ‎तुम दरबारी हो, तुम्हारी बे आबरूई दरबार की बे आबरूई है, क़र्ज़ा बढ़ रहा है। 

    मीरज़ा: तो ये भट्ट गिरी हुई।
    ‎ 
    बेगम: तो क़सीदा और क्या होता है। मेरी मानो, सीधी सीधी बातें लिक्खो, मगर वही ‎आग़ा ऐश की बीवी की बात, तुम उस तरह लिख ही नहीं सकते। 

    मीरज़ा: लिख नहीं सकता? यूं वाहियात बकना क्या मुश्किल है, सन लो; 

    न कहूं आपसे तो किससे कहूं 
    मुद्दआ-ए-ज़रूरी अल इज़हार 
    ‎ 
    पीर-ओ-मुर्शिद अगरचे मुझको नहीं 
    ज़ौक़-ए-आराइश-ए-सरोद-ओ-तार  
    ‎ 
    कुछ तो जाड़े में चाहिए आख़िर 
    ताना दे बाद-ए-ज़महरीर आज़ार 
    ‎ 
    क्यों न दरकार हो मुझे पोशिश 
    जिस्म रखता हूँ, है अगरचे नज़ार 
    ‎ 
    कुछ ख़रीदा नहीं है अब के साल 
    कुछ बनाया नहीं है अब के बार 
    ‎ 
    आग तापे कहां तलक इंसान 
    धूप खाए कहां तलक जानदार 
    ‎ 
    धूप की ताबिश आग की गर्मी 
    वक़िना रब्बना अज़ाबन्नार  
    ‎ 
    बेगम: (बीच में) बात हुई न? और वो क़र्ज़ और तनख़्वाह का मुआमला? 

    मीरज़ा: (कान से क़लम उतार कर फिर लिखने लगते हैं और साथ ही साथ पढ़ते जाते ‎हैं) 

    मेरी तनख़्वाह जो मुक़र्रर है 
    ऊस के मिलने का है अजब हंजार 
    ‎ 
    रस्म है मुर्दे की छः माही एक 
    ख़ल्क़ का है उसी चलन पे मदार 
    ‎ 
    मुझको देखो तो हूँ ब-क़ैद-ए-हयात 
    और छः माही हो साल में दोबार 
    ‎ 
    बस कि लेता हूँ हर महीने क़र्ज़ 
    और रहती है सूद की तकरार 
    ‎ 
    मेरी तनख़्वाह में तिहाई का 
    हो गया है शरीक साहूकार 
    ‎ 
    ज़ुल्म है गर न दो सुख़न की दाद 
    क़ह्र है गर करो न मुझको प्यार 
    ‎ 
    आपका बंदा और फिरूँ नंगा 
    आपका नौकर और खाऊँ उधार

    मेरी तनख्वाह कीजिए माह ब माह
    ता न हो मुझको ज़िंदगी दुशवार 
    ‎ 
    बेगम: बात हुई न? जब तुम यूं लिख सकते हो तो फिर हमेशा इसी तरह क्यों नहीं ‎लिखते। देख लेना दाद भी ख़ूब मिलेगी और बादशाह सलामत को हक़ीक़त-ए-हाल भी ‎मालूम हो जाएगी। 

    मीरज़ा: ख़ैर दाद तो जो मिलेगी, मालूम। अलबत्ता क़सीदा गया। छत्तीस के क़रीब ‎अशआर हो गए हैं, एक दो दुआइया रास्ते में लगा दूंगा। तर्तीब भी बदल दूँगा, मुकम्मल ‎काम हो गया, चलो तुम्हारा कहा भी कर देखता हूँ। 

    (इतने में मग़रिब की अज़ान सुनाई देती है, बेगम नमाज़ के लिए ज़नाने में चली जाती ‎हैं और ग़ालिब कपड़े बदलने लगते हैं। कुलाह पपाख़ का तिर्छा ज़ाविया बना रहे थे कि ‎बेगम लौट आती हैं)‎
    ‎ 
    बेगम: खाना अभी खाओगे या वापस लौट कर। 

    मीरज़ा: खाना? कहाँ से आगया? और तुम इतनी जल्दी कैसे लौट आईं? नमाज़ तो ख़ुदा ‎के दरबार में हुज़ूरी होती है मगर तुम करो भी क्या। आख़िर तुम्हें नमाज़ों से क्या ‎हासिल? जन्नत में हम जाएं तो हमें हूरें मिलेंगी, तुम्हें क्या मिलेगा? कोई मस्जिद का ‎मुल्ला, नीला तहमद, खद्दर का कुर्ता, कांधे पर रूमाल, रूमाल में हुजरे की कुंजी, सर ‎पर पग्गड़, और हम... जनाब दाएं तरफ़...  
    ‎ 
    बेगम: (बिगड़ कर) देखिए ये तमस्खुर अब छोड़िए, मैं कह चुकी हूँ ख़ुदा और रसूल के ‎अहकाम पर फब्तियां न किया करो, ये उसी का वबाल है कि मेरे बच्चे ज़िंदा नहीं ‎रहते। आरिफ़ को पाला था वो भी...(बेगम की आँखें नमनाक होजाती हैं। ग़ालिब भी ‎नमनाक हो जाते हैं, इतने में बाहर से कहारों की आवाज़ आती है, “पीनस हाज़िर।”)  

    बेगम: नवाब ख़ैर से सवार हो जाइए और कोई अच्छी ख़बर लाइए। 

    मिर्ज़ा: (ज़ेर-ए-लब) “बेमाया चूमाई कि मिर्ज़ा रिन्दही।” कहते हुए बाहर चले जाते हैं, ‎बेगम ज़नाने में लौट आती हैं।

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