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नज़्म
तुम्हें क्या
कि चेहरों से अटी दुनिया में तन्हा साँस लेती
हाँफती रातों के बे-घर हम-सफ़र
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
घर से बे-घर हो कर हम तो मारे मारे फिरते हैं
ये बंजारा दिल देखो अब हम को किधर ले जाएगा