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ग़ज़ल
भीड़ बाज़ार-ए-समा'अत में है नग़्मों की बहुत
जिस से तुम सामने उभरो वो सदा दो हम को
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
सोज़-ए-दिल अपना उस को क्या 'मुसहफ़ी' सुनावें
आगो ही वो फिरे है कानों से शाल बाँधे
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तंज़-ओ-मज़ाह
After all, a ship-wreck is much safer than an air-crash! Don’t you agree?...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
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ग़ज़ल
ग़र्क़ हो कर रोल लो मोती ख़ुद अपने वास्ते
डूब कर उभरो तो औरों के लिए साहिल बनो



