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ग़ज़ल
इक हसीना की सियह-ज़ुल्फ़ों पे झाला यूँ लगे
नाग काला छग के जैसे पी गया है बर्फ़ बर्फ़
मसूद हस्सास
नज़्म
लफ़्ज़ परों की तरह होते हैं
ये अपना अपना दाना दुन्का चुग कर
तुम्हारी ओर उड़ जाते हैं
जानाँ मलिक
नज़्म
दो लड़ें तीसरे का भला हो
खेत में चंद मुर्ग़ियाँ हम-सिन
चुग रही थीं ख़ुशी ख़ुशी इक दिन
बन्ने मियाँ जौहर
ग़ज़ल
न 'अज़फ़री' से करो नज़्म ओ नस्र का मज़कूर
न जी कुछ इन दिनों अपना दिमाग़ चाग़ नहीं
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
ग़ज़ल
ये ताइर ऊँघते रहते हैं बैठे सब्ज़ गुम्बद पर
अगर चुग लें कहीं से हिम्मत-ए-परवाज़ आने दो
क़मर रईस
ग़ज़ल
कोई तो फ़िक्र शब-ओ-रोज़ चुग रही है मुझे
नहीं तो कैसे निशाँ इतने बर-जबीं पड़ते
