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शेर
सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या
उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या
हफ़ीज़ बनारसी
नज़्म
एक नज़्म
दीवाली की रात आई है तुम दीप जलाए बैठी हो
मासूम उमंगों को अपने सीने से लगाए बैठी हो




