aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ".dju"
अमीर हम्ज़ा
born.1989
लेखक
जान-ए-जाँ तुझ से दू-बदू हो करमैं ने ख़ुद से शिकस्त खाई है
चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी
मैं जो हूँ क्या नहीं हूँ मैं ख़ुद भीख़ुद से बात आज दू-बदू ठहरे
नहीं इश्क़ जिस दू बड़ा कोड़ हैकधीं उस से मिल बे-सिया जाए ना
हर इक मक़ाम से आगे गुज़र गया मह-ए-नौकमाल किस को मयस्सर हुआ है बे-तग-ओ-दौ
डौ ڈَو
رک : ڈونگی ، چھوٹی کشتی.
दू دو
सोना
जू جُو
नदी, छोटी नदी, नहर, कुल्या, स्रोत, सोता, चश्मा।
जू' جُوع
भूक, बुभुक्षा, हवस, लालच
Les Contes Du Hub Tarang
सय्यद मोहिउद्दीन क़ादरी
मसनवी
Du-Badu
अनवर अफ़ाक़ी
Guftugu: Doo Ba Doo
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
इंटरव्यू / साक्षात्कार
Khwab-e-Hasti
मोहम्मद अब्दुल ग़नी
रोमांनवी
Daau
जारजी अरनाद
Du Badu
फ़ज़्ल-ए-हसनैन
हास्य-व्यंग
Dau Salah Rudad Anjuman Khuddamul-Sufiya
करम इलाही करीम
सूफ़ीवाद / रहस्यवाद
अस्सी दिन में दुनिया के गिर्द चक्कर
ज़ौल वरन
Du Shahzade
सुबिया सदफ
कहानी
महशर में और उन से मिरी दू-ब-दू न होकहने की बात है जो कोई गुफ़्तुगू न हो
मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करतेकि गुल तुम्हारी बहारों में आरज़ू करते
हयात गर्म-ए-तग-ओ-दौ है मैं नहीं तो क्या
“मुझे मत सताईए... ख़ुदा की क़सम, मैं आपसे कहती हूँ, मुझे मत सताईए।”...
तग-ओ-दौ में रहता था, लेकिन यकायक हुआ क्या ये मुझ कोये महसूस होता है सोते से उट्ठा हूँ, हिलने से क़ासिर
ख़ुदी भी हमारी ख़ुदाई सहीवही हम-नशीं है वही दू-ब-दू है
हमें भी मतलब-ओ-मअ'नी की जुस्तुजू है बहुतहरीफ़-ए-हर्फ़ मगर अब के दू-ब-दू है बहुत
मजाल क्या है जो दू-बदू हो नज़र से कोई नज़र लड़ावेमगर किसी ने जो उस को देखा तो सौ ख़राबी से छुप छुपा कर
ख़मोशियाँ थीं जो दू-ब-दू थीं ख़मोशियाँ थीं जो चार सू थींख़मोशियाँ थीं जो थीं तकल्लुम न तुम वो तुम थे न हम वो हम थे
اسے ان تحریروں میں وہ باتیں نظر آئیں جو وہ خود ’’الجھے الجھے اور مبہم طریقے‘‘ سے سوچتا رہا تھا۔ بودلیر نے ۱۸۴۷ء میں پوکو پہلی بار پڑھا اور اس کا مشہور مجموعہ کلام ’’بدی کے پھول‘‘ (LESFLEURS DU MAL) ۱۸۵۷ء میں شائع ہوا۔...
आप की दुश्मनी का मैं हूँ मो'तरिफ़वार कीजे मगर दू-बदू कीजिए
उसी की दीद को अब रात दिन तड़पते हैंकि जिस से बात न की हम ने दू-बदू हो कर
कैसे हैं ये अरमान ये काविश ये तग-ओ-दौमंज़िल नहीं मालूम तो घर क्यूँ नहीं जाते
शाइ'री में लिसानी तोड़-फोड़ की कोई ऐसी मिसाल नहीं है जो कुल्लियतन नई हो। तमाम तोड़-फोड़ के इम्कानात ज़बान के साथ-साथ वजूद में आते रहते हैं। आख़िर इसकी क्या वज्ह है कि ईरानियों ने अ'रबी, तुर्की, फ़्रांसीसी अल्फ़ाज़ तो मुस्तआ'र लिए और उन पर कस्रा-ए-इज़ाफ़त का अ'मल जाएज़ क़रार दिया...
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books