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नज़्म
जुगनू
ये शाख़-सार के झूलों में पेंग पड़ते हुए
ये लाखों पत्तियों का नाचना ये रक़्स-ए-नबात
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
हिण्डोला
इसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन की
इन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थे
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
हम भी लै को तेज़ करेंगे बूँदों की बौछार के साथ
पहला सावन झूलने वालो तुम भी पेंग बढ़ा देना
रईस फ़रोग़
शेर
मौसम-ए-होली है दिन आए हैं रंग और राग के
हम से तुम कुछ माँगने आओ बहाने फाग के
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
पेंग वहशत में बढ़े हैं तिरे दीवानों के
अब बयाबाँ भी उन्हें सहन हैं ज़िंदानों के
रियाज़ ख़ैराबादी
नज़्म
शुऊर
लहू में ग़र्क़ हैं और शश-जहात का आहंग
ज़मीं की पेंग तुलू-ए-नुजूम-ओ-शम्स-ओ-क़मर