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ग़ज़ल
निगाह-ए-बादा-गूँ यूँ तो तिरी बातों का क्या कहना
तिरी हर बात लेकिन एहतियातन छान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
समस्त
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ग़ज़ल
रहा है तू ही तो ग़म-ख़्वार ऐ दिल-ए-ग़म-गीं
तिरे सिवा ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहूँ तो किस से कहूँ
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
बंजारा-नामा
ये खेप भरे जो जाता है ये खेप मियाँ मत गिन अपनी
अब कोई घड़ी पल सा'अत में ये खेप बदन की है कफ़नी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
चश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाब
जिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँ



