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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
अल्लामा सय्यद-'शफ़ीक़'-हसन-एलिया के पोते
सय्यद-'जौन'-एलिया हसनी-उल-हुसैनी सपूत-जाह''
जौन एलिया
ग़ज़ल
कूच अपना उस शहर तरफ़ है नामी हम जिस शहर के हैं
कपड़े फाड़ें ख़ाक-ब-सर हों और ब-इज़्ज़-ओ-जाह चलें
जौन एलिया
नज़्म
सोचने दो
इस के सफ़-बस्ता दरीचों में से किस में अव्वल
ज़ह हुई सुर्ख़ शुआओं की कमाँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
वो ख़्वाब जो आसूदगी-ए-मर्तबा-ओ-जाह से
आलूदगी-ए-गर्द-ए-सर-ए-राह से मासूम!
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
'मोमिन' वही ग़ज़ल पढ़ो शब जिस से बज़्म में
आती थी लब पे जान ज़ह-ओ-हब्बज़ा के साथ
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मिरे शाह-ए-सुलैमाँ-जाह से निस्बत नहीं 'ग़ालिब'
फ़रीदून ओ जम ओ के ख़ुसरव ओ दाराब ओ बहमन को
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हम जाह-ओ-हशम याँ का क्या कहिए कि क्या जाना
ख़ातिम को सुलैमाँ की अंगुश्तर-ए-पा जाना
मीर तक़ी मीर
शेर
ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा



