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नज़्म
फ़रमान-ए-ख़ुदा
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इंतिसाब
जिस की बेटी को डाकू उठा ले गए
हाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
परछाइयाँ
कि दूर दूर के मुल्कों में क़हत बो जाएँ
बहुत दिनों से जवानी के ख़्वाब वीराँ हैं
साहिर लुधियानवी
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ग़ज़ल
है अब इस मामूरे में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त 'असद'
हम ने ये माना कि दिल्ली में रहें खावेंगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
मौज़ू-ए-सुख़न
ये हसीं खेत फटा पड़ता है जौबन जिन का!
किस लिए इन में फ़क़त भूक उगा करती है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़्वाब नहीं देखा है
शहर से दूर किसी गाँव में रह जाने का
खेत खलियानों में बाग़ों में कहीं गाने का
