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ग़ज़ल
तुझे हादसात-ए-पैहम से भी क्या मिलेगा नादाँ
तिरा दिल अगर हो ज़िंदा तो नफ़स भी ताज़ियाना
जिगर मुरादाबादी
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नज़्म
होली
कोई दिलाती है साथिन को यार की सौगंद
कि अब तो जामा-ओ-अंगिया के टोले हैं सब बंद
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
होली
पखालें मश्कें छुटीं रंग की पड़ी पौछार
और चार तरफ़ से पिचकारियों की मारा मारा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
होली
सब चूमने वाले गिर्द दुखड़े नज़ारा करते हँसी-ख़ुशी
महबूब नशे की ख़ूबी में फिर आशिक़ ऊपर घड़ी घड़ी
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
चार दिन की ज़ीस्त में बस चार पल ख़ुशियों के हैं
किस लिए फिर रात दिन मातम तू मुझ से बात कर
ऋतु सिंह राजपूत रीत
ग़ज़ल
ज़रा ठोकर लगे तो ख़ुद-कुशी की बात करता है
बशर इस दौर का कुछ उलझनों से कितना डरता है
ऋतु सिंह राजपूत रीत
ग़ज़ल
ये होगी भूल दिल की जो सफ़र आसान ये समझे
बड़ी टेढ़ी मशक़्क़त से सफ़र मंज़िल से मिलता है

