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ग़ज़ल
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
बहादुर शाह ज़फ़र
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ग़ज़ल
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही
उस ने जो फेर ली नज़र मैं ने भी जाम रख दिया
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अहमद सलमान
नज़्म
इतना मालूम है!
और घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाह
हर सतर में मिरा चेहरा उभर आया होगा
परवीन शाकिर
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
उसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगे
न जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगी



