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ग़ज़ल
तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ
हुस्न-ए-यज़्दाँ से तुझे हुस्न-ए-बुताँ तक देखूँ
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
मुफ़्लिसी
इक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहीं
ये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
रोटियाँ
अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँ
अब आगे जिस के माल-पूए भर के थाल हैं






