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ग़ज़ल
रूप-सरूप की जोत जगाना उस नगरी में जोखम है
चारों खूँट बगूले बन कर घोर अंधेरे फिरते हैं
सय्यद आबिद अली आबिद
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ग़ज़ल
एक सदा के लम्स में वक़्त के चारों खोंट भिगो लें
गूँज में लिपटे याद के कोहना रस्तों पर फिर हो लें
अम्बरीन सलाहुद्दीन
ग़ज़ल
चारों खोंट फिरा हूँ लेकिन अपने आप को पा न सका
घर आ कर ये राज़ खुला है सम्त-ओ-सफ़र में कुछ भी नहीं
उनवान चिश्ती
ग़ज़ल
चौथे खूँट को जा तो रहे हो लेकिन ये वो रस्ता है
तुम ने अगर मुड़ कर देखा तो पत्थर के हो जाओगे
शाहिद इश्क़ी
नज़्म
यक-निकाती अजेंडा
जो पत्तों और गुच्छों से लद जाएँगी
अभी मैं ने गुलाब के पौदों की अपने हाथों से काँट-छाँट की है
मोहम्मद हनीफ़ रामे
ग़ज़ल
नासिर शहज़ाद
ग़ज़ल
दिल के गिर्द हिसार खिंचा तो उस का मिलना मुहाल हुआ
चारों खूँट आवारा फिरे जब पाँव भी अपने टूट गए
शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा
ग़ज़ल
रूप सरूप की जोत जगाना इस नगरी में जोखिम है
चारों खोंट बगूले बन कर घोर अँधेरे फिरते हैं


