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नज़्म
शिकवा
टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे
पाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
नासिर काज़मी
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नज़्म
ये बातें झूटी बातें हैं
गर इश्क़ किया है तब क्या है क्यूँ शाद नहीं आबाद नहीं
जो जान लिए बिन टल न सके ये ऐसी भी उफ़्ताद नहीं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
बंजारा-नामा
क्या लौंडी बांदी दाई दवा क्या बंदा चेला नेक-चलन
क्या मंदर मस्जिद ताल कुआँ क्या खेती बाड़ी फूल चमन
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
किसी को उदास देख कर
तुम अपने हुस्न की रानाइयों पे रहम करो
वफ़ा फ़रेब है तूल-ए-हवस है कुछ भी नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
सुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्ना
ज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ग़ालिब
बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे
गुलज़ार
नज़्म
जश्न-ए-ग़ालिब
जो वादा-ए-फ़र्दा पर अब टल नहीं सकते हैं
मुमकिन है कि कुछ अर्सा इस जश्न पे टल जाएँ


