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नज़्म
जश्न-ए-ग़ालिब
'ग़ालिब' जिसे कहते हैं उर्दू ही का शाइर था
उर्दू पे सितम ढा कर 'ग़ालिब' पे करम क्यूँ है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
क़तील शिफ़ाई
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ग़ज़ल
अब तुझ से किस मुँह से कह दें सात समुंदर पार न जा
बीच की इक दीवार भी हम तो फाँद न पाए ढा न सके
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तौबा की नाज़िशों पे सितम ढा के पी गया
''पी''! उस ने जब कहा तो मैं घबरा के पी गया
एहसान दानिश कांधलवी
उद्धरण
सआदत हसन मंटो
ग़ज़ल
तिरा ग़म समा गया है मिरे दिल की धड़कनों में
कोई ऐश जब भी आया मिरे दिल ने बद-दुआ दी
आमिर उस्मानी
शेर
दोस्त ने दिल को तोड़ के नक़्श-ए-वफ़ा मिटा दिया
समझे थे हम जिसे ख़लील काबा उसी ने ढा दिया
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
नूह नारवी
ग़ज़ल
तेशे की क्या मजाल थी ये जो तराशे बे सुतूँ
था वो तमाम दिल का ज़ोर जिस ने पहाड़ ढा दिया



