aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "Dhak"
धक धक की धुन पे रक़्स-कुनाँ है अभी भी दिलये कम क्या इल्तिफ़ात है चल रक़्स करते है
मुर्ली धर शाद
शायर
बद्रीनाथ उपध्याय 'प्रेम धन'
बाल गंगा धर तिलक जी महाराज
लेखक
धन गोपाल मुकरजी
शिव धन सिंह
जग बहादुर धर
योगदानकर्ता
लीला धर गुप्ता
बंसी धर
died.1880
बाबू मुर्ली धर
इस्लामिक सिम्पोज़ियम ढाका
पर्काशक
एश प्रेम धर चित
गंगा धर प्रशाद शुक्ला
आदम पब्लिकेशन, ढाका
शंकर लाल मुर्ली धर
संपादक
शीला धर
न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगेये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
रफ़्ता रफ़्ता हर इक ज़ख़्म भर जाएगासब निशानात फूलों से ढक जाएँगे
ज़मीन जिस्मों से ढक गई हैक़दम तो क्या तिल भी धरने की अब जगह नहीं है
भरी दोपहर में सर अपना जो ढक कर मिलने आती थींजो पंखे हाथ के झलती थीं और बस पान खाती थीं
ख़ाकخاک
मिट्टी, मृत्तिका
ढकڈَھک
cover
धकدَھک
संवेग या डर से हृदय के अचानक धड़कने का भाव
चाकچاک
फटा हुआ, कटा हुआ, चीरा हुआ, दरीदा, शिगाफ़ता
Dhak Ke Do Pat
ज़ेहरा मसहूर
महिलाओं की रचनाएँ
Dhal Gai Sham Gham
अतीया परवीन बिलग्रामी
Chin Men Communist Inqalab Ka Mazi, Hal Aur Mustaqbil
ए. डॉक. बारेंट
सांस्कृतिक इतिहास
Daak Bangla
ए. हमीद
नॉवेल / उपन्यास
ज़रा ये धूप ढल जाये
ख़ुशबीर सिंह शाद
काव्य संग्रह
February
सुरूर बाराबंकवी
आब-ओ-गिल, ढाका
Aasudgan Dhaka
हबीबुर्रहमान
Dhan Katne Ke Bad
अनवर अज़ीम
Dhal Gai Raat
रज़िया बट्ट
रोमांटिक
Dhai Ghar
गिरी राज किशोर
अनुवाद
Shirimad Bhagwat Gita Rahassia
Dhai Hafta Pakistan Mein Ya Mubarak Safar
अब्दुल माजिद दरियाबादी
सफ़र-नामा / यात्रा-वृतांत
Sans Ki Dhar
क़ैसर शमीम
ग़ज़ल
Gul-o-Anjum
असलहे, सिक्के और डाक टिकट में इस्लामियात
वाहिद नज़ीर
शोध
एक का हर दम ख़ून सुखातीएक पड़े हैं धन को डुबोए
ज़ैनब की बे-रिदाई ने सर मेरा ढक दियाआग़ाज़-ए-सुब्ह-ए-नौ हुई वो शाम शाम की
कभी कभार तिरे जिस्म का अकेला-पनमिरे ख़याल की उर्यानियत को ढक जाए
आपा मिरे हिस्से की रोटीचंगीर में ढक कर रखती है
रफ़्ता-रफ़्ता हर इक ज़ख़्म भर जाएगासब निशानात फूलों से ढक जाएँगे
जिन को दीवार-ओ-दर भी ढक न सकेइस क़दर बे-लिबास हैं कुछ लोग
दरवाज़े को दस्तक ज़िंदा रखती हैजैसे दिल को धक-धक ज़िंदा रखती है
कुछ दर-बदरी रास बहुत आई है मुझ कोकुछ ख़ाना-ख़राबों में मिरी धाक बहुत है
इसी से मैं भी तन ढक लूँगी अपनाइसी से तुम भी आसूदा रहोगे!
तय हो चुके सब आबला-पाई के मरहलेअब ये ज़मीं गुलाबों से ढक जाना चाहिए
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