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ग़ज़ल
ख़ाक अपनी ख़ाक-ए-कूचा-ए-जानाँ में जा मिली
एहसानमंद-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ नहीं हैं हम
अब्र अहसनी गुन्नौरी
शेर
उल्फ़त-ए-कूचा-ए-जानाँ ने किया ख़ाना-ख़राब
बरहमन दैर से का'बे से मुसलमाँ निकला
वज़ीर अली सबा लखनवी
ग़ज़ल
हम ए’तकाफ़-ए-कूचा-ए-जानाँ न कर सके
दाग़-ए-जिगर को शो'ला-ए-रक़्साँ न कर सके
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
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ग़ज़ल
ख़ाली आशिक़ से कभी कूचा-ए-जानाँ न रहा
कौन सी शब वो थी जिस में कोई गिर्यां न रहा
जमीला ख़ुदा बख़्श
शेर
बे-ख़ुदी कूचा-ए-जानाँ में लिए जाती है
देखिए कौन मुझे मेरी ख़बर देता है
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
'आज़ुर्दा' मर के कूचा-ए-जानाँ में रह गया
दी थी दुआ किसी ने कि जन्नत में घर मिले
मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
नज़्म
ख़बर है कि नहीं
अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं
तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
कूचा-ए-जानाँ में जा निकले जो ग़िल्माँ भूल कर
याद हो उस को न फिर गुलज़ार-ए-रिज़वाँ भूल कर
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
हूँ दफ़्न मर के कूचा-ए-जानाँ के सामने
बुलबुल का आशियाँ हो गुलिस्ताँ के सामने
मुंशी शिव परशाद वहबी
शेर
कूचा-ए-जानाँ में यारो कौन सुनता है मिरी
मुझ से वाँ फिरते हैं लाखों दाद और बे-दाद में



