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ग़ज़ल
सोज़-ए-दिल है ख़ामुशी से जल के बुझ जाने का नाम
ज़िंदगी है शम-ए-गुल के अश्क बरसाने का नाम
कौसर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
सोज़-ए-दिल बढ़ने न पाए आँख तक ऐ ज़ब्त-ए-ग़म
आग भड़का देगा ये इस ख़ाना-ए-ख़स-पोश में
ऐमन अमृतसरी
ग़ज़ल
सोज़-ए-दिल आह-ए-शरर-बार से पहचानते हैं
लोग तूफ़ान को आसार से पहचानते हैं
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
शेर
सर्द आहों का तसर्रुफ़ हो तो सोज़-ए-दिल कहाँ
दिल से जो शो'ला उठा वो भी धुआँ बनता गया