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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
गुमाँ में मेरे शायद इक कोई ग़ुंचा खिला तो था
वो मेरी जावेदाना बे-दुई का इक सिला तो था
जौन एलिया
ग़ज़ल
ख़ीरा-सरान-ए-शौक़ का कोई नहीं है जुम्बा-दार
शहर में इस गिरोह ने किस को ख़फ़ा नहीं किया
जौन एलिया
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
तमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत है
हज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरें
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
किस से मोहब्बत है
मिरा ईमाँ है मेरी ज़िंदगी है मेरी जन्नत है
मेरी आँखों को ख़ीरा कर गईं ताबानियाँ उस की
असरार-उल-हक़ मजाज़
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khiira
खीरा کِھیرَہ
رک : کِھیرا (۱).
khiiraa
खीरा کھیرا
ककड़ी जाति का एक प्रकार का फल; बहुफला; सुगर्भक, एक छोटी और मोटी ककड़ी जिस का छिलका गहरा भूरा और हरा भी होता है, इस का किनारा काट कर रगड़ने से दूध निकलता है और इस तरह इस की कड़वाहट दूर होजाती है, ये कच्चा खाया जाता है
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ग़ज़ल
ख़ीरा न कर सका मुझे जल्वा-ए-दानिश-ए-फ़रंग
सुर्मा है मेरी आँख का ख़ाक-ए-मदीना-ओ-नजफ़
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क्या रोऊँ ख़ीरा-चश्मी-ए-बख़्त-ए-सियाह को
वाँ शग़्ल-ए-सुर्मा है अभी याँ सैल ढल गया
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
तालिब की आँख करती है ख़ीरा शुआ-ए-हुस्न
पर्दा है उस का नाम ये बे-पर्दगी नहीं
मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़
नज़्म
पहला जश्न-ए-आज़ादी
वो सैल-ए-नूर है ख़ीरा है आदमी की नज़र
ब-सद ग़ुरूर-ओ-अदा ख़ंदा-ज़न है गर्दूं पर
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
होश पर बिजली गिरी आँखें भी ख़ीरा हो गईं
तुम तो क्या थे इक झलक सी थी तुम्हारी याद की
असग़र गोंडवी
ग़ज़ल
जो है 'फ़य्याज़' उस को देख कर मबहूत हैरत क्या
तड़पती है जो बिजली आँख ख़ीरा हो ही जाती है
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
जलवों की फ़रावानी तौबा दम भर में हुईं ख़ीरा नज़रें
वो सामने बे-पर्दा थे मगर हम से ही नज़ारा हो न सका
ऐश मेरठी
ग़ज़ल
ये मुग़बचे तिरे साक़ी अभी हैं ख़ीरा बहुत
हर एक जाम-ए-तही और सला-ए-आम के बा'द
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
नज़्म इत्तिहाद
दिन रात हम हों और हों अहबाब-ए-ख़ीरा-सर
ईमान-दारीयों में कटी ज़िंदगी अगर



