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कुल्लियात
हो चुका ख़ून-ए-जिगर रोना नहीं कुछ कम हनूज़
हैं मिज़ा दस्तूर-ए-साबिक़ ही ये मेरी नम हनूज़
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
रो चुका ख़ून-ए-जिगर सब अब जिगर में ख़ूँ कहाँ
ग़म से पानी हो के कब का बह गया मैं हूँ कहाँ
मीर तक़ी मीर
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KHuun-e-jigar bahaanaa
ख़ून-ए-जिगर बहाना خُونِ جِگَر بَہانا
अत्यधिक परिश्रम करना, बहुत मेहनत करना, कड़ी मेहनत
KHuun-e-jigar pilaanaa
ख़ून-ए-जिगर पिलाना خُونِ جِگَر پِلانا
अपनी सारी उर्जा लगा कर किसी की पालन-पोषण करना, किसी परंपरा को बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करना
KHuun-e-jigar se paalnaa
ख़ून-ए-जिगर से पालना خُونِ جِگَر سے پالْنا
रुक : ख़ून जिगर से सींचना
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शेर
माल-ओ-ज़र की क़द्र क्या? ख़ून-ए-जिगर के सामने
अहल-ए-दुनिया हेच हैं अहल-ए-हुनर के सामने
तालिब हुसैन तालिब
ग़ज़ल
मुफ़्त है ख़ून-ए-जिगर अज़्मत-ए-किरदार के साथ
अश्क मिलते हैं यहाँ दीदा-ए-बेदार के साथ
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
ग़ज़ल
न हो गुल-रंग जब ख़ून-ए-जिगर से ज़िंदगी क्या है
मुनव्वर शहर-ए-दिल जिस से न हो वो रौशनी क्या है
महमूदुल हसन
शेर
मिरा ख़ून-ए-जिगर पुर-नूर बन जाए तो अच्छा हो
तुम्हारी माँग का सिन्दूर बन जाने तो अच्छा हो
अली ज़हीर रिज़वी लखनवी
ग़ज़ल
मता-ए-ख़ून-ए-जिगर अश्क को पिला बैठे
असासा हाथ में जितना था सब उठा बैठे
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
शेर
तल्ख़ियाँ ख़ून-ए-जिगर की शा'इरी में घोल कर
चंद मिसरे' लाएँ हैं हम भी सुनाने के लिए
अरमान ख़ान अरमान
ग़ज़ल
ख़ून-ए-दिल होता रहा ख़ून-ए-जिगर होता रहा
ये तमाशा 'इश्क़ में शाम-ओ-सहर होता रहा