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नज़्म
मैं जिंसी खेल को सिर्फ़ इक तन-आसानी समझता हूँ
इबादत का तरीक़ा हरकतें हैं तिश्ना ओ मुबहम
कभी रूह-ए-सनम बेदार ख़्वाब-ए-मर्ग-ए-मुहमल से
मीराजी
शेर
तुम आओ मर्ग-ए-शादी है न आओ मर्ग-ए-नाकामी
नज़र में अब रह-ए-मुल्क-ए-अदम यूँ भी है और यूँ भी
साइल देहलवी
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शेर
'क़ाएम' हयात-ओ-मर्ग-ए-बुज़-ओ-गाव में हैं नफ़अ
इस मर्दुमी के शोर पे किस काम का हूँ मैं
क़ाएम चाँदपुरी
नज़्म
मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत
आओ कि मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत मनाएँ हम
आओ कि हुस्न-ए-माह से दिल को जलाएँ हम


