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नज़्म
मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत
आओ कि मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत मनाएँ हम
आओ कि हुस्न-ए-माह से दिल को जलाएँ हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
दिल बेताब-ए-मर्ग-ए-ना-गहाँ बाक़ी न रह जाए
मोहब्बत का ये नाज़ुक इम्तिहाँ बाक़ी न रह जाए
मुशीर झंझान्वी
ग़ज़ल
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
आख़िरी मुलाक़ात
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मोहब्बत मनाएँ हम!
आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िंदा की सदा
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
किस ख़ता पर ये उठाना पड़ी रातों की सलीब
हम ने देखा था अभी ख़्वाब-ए-सहर ही कितना


