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नज़्म
तज्दीद-ए-अमल
काला हो कि गोरा हो ख़ुदा एक है सब का
क़ौमिय्यत-ए-बेजा की रिवायात बदल डाल
फ़ैज़ लुधियानवी
नज़्म
तिजारत
फिर ख़रीदो ब्याह का सामान पहले जान लो
बस तिजारत ही उरूस-ए-क़ौमीयत का राज है
फ़ैज़ लुधियानवी
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ग़ज़ल
आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र 'फ़ैज़' न जाने क्या हुए
रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई