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ग़ज़ल
जिसे देखो रखे है सर पे अपने ताज-ए-सुल्तानी
हँसी ठट्ठा समझ रक्खा है हर इक ने जहाँबानी
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीरा लट पटा है
क्या क़त्ल कूँ हमारे अब ठाठ यूँ ठठा है
आबरू शाह मुबारक
नज़्म
मुझे तन्हा ही रहने दो
यहाँ मैं जज़्ब की हालत में घंटों खोया रहता हूँ
मगर कोई मिरा ठट्ठा नहीं करता
काशिफ़ रफ़ीक़
शेर
क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीरा लट पटा है
क्या क़त्ल कूँ हमारे अब ठाठ यूँ ठठा है
आबरू शाह मुबारक
नज़्म
शिकवा
किस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ को
किस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ को









