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ग़ज़ल
खींच लाएगी कोई मिस्रा-ए-तर आख़िर-ए-कार
ज़ुल्फ़ ज़ंजीर से नाज़ुक है मगर आख़िर-ए-कार
तालिब हुसैन तालिब
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aaKHir-e-aaKHar
आख़िर-ए-आख़र آخِرِ آخَر
अंतिम, अनन्त (भगवान के लिए प्रयुक्त)
yaum-e-aaKHar
यौम-ए-आख़र یَومِ آخَر
उठाए जाने का दिन, बहुत मुसीबत और परेशानी का दिन
jis ghar hove puruus kuchaliyaa, us ghar hove khiir kaa daliyaa
जिस घर होवे पुरूष कुचलिया, उस घर होवे खीर का दलिया جِس گھر ہوئے پُروش کُچَلْیا، اُس گھر ہووے کِھیر کا دَلْیا
ahiir kaa kyaa jajmaan aur lapsii kaa kyaa pakvaan
अहीर का क्या जजमान और लपसी का क्या पकवान اَہِیر کا کیا ججمان اور لَپسی کا کیا پَکوان
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कुल्लियात
चश्म वा देख के इस बाग़ में कीजो नर्गिस
आँखों से जाती रहेगी ये बहार आख़िर-ए-कार
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
कैसी सई हवादिस ने की आख़िर-ए-कार हलाक किया
क्या क्या चर्ख़ ने चक्कर मारे पीस के मुझ को ख़ाक किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
न जाने क्या कहें ऐ 'ख़ार' आह-ए-सर्द को मेरी
मिरे नाले को जो बे-वक़्त की कहते हैं शहनाई
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
'ख़ार' है जल्वा-ए-अस्नाम से दिल ख़ुल्द-ए-बरीं
या परी-ज़ादों का मजमा' है परी-ख़ाने में
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
क़दम ले कर कलेजे से लगाते हैं कभी उस को
कभी होते हैं हम चश्म ओ लब ओ रुख़्सार के सदक़े
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
ख़ुदाई का अगर करते हैं दावा बुत नहीं बेजा
निगाह-ए-लुत्फ़ से देखें तो तक़दीरें बदलती हैं