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ग़ज़ल
खींच लाएगी कोई मिस्रा-ए-तर आख़िर-ए-कार
ज़ुल्फ़ ज़ंजीर से नाज़ुक है मगर आख़िर-ए-कार
तालिब हुसैन तालिब
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'aashiq-e-be-chaara
'आशिक़-ए-बे-चारा عاشِقِ بے چارَہ
बेकस और मजबूर आशिक़
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कुल्लियात
चश्म वा देख के इस बाग़ में कीजो नर्गिस
आँखों से जाती रहेगी ये बहार आख़िर-ए-कार
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
कैसी सई हवादिस ने की आख़िर-ए-कार हलाक किया
क्या क्या चर्ख़ ने चक्कर मारे पीस के मुझ को ख़ाक किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
न जाने क्या कहें ऐ 'ख़ार' आह-ए-सर्द को मेरी
मिरे नाले को जो बे-वक़्त की कहते हैं शहनाई
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
'ख़ार' है जल्वा-ए-अस्नाम से दिल ख़ुल्द-ए-बरीं
या परी-ज़ादों का मजमा' है परी-ख़ाने में
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
क़दम ले कर कलेजे से लगाते हैं कभी उस को
कभी होते हैं हम चश्म ओ लब ओ रुख़्सार के सदक़े
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
ख़ुदाई का अगर करते हैं दावा बुत नहीं बेजा
निगाह-ए-लुत्फ़ से देखें तो तक़दीरें बदलती हैं