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शेर
उन्हीं को अर्ज़-ए-वफ़ा का था इश्तियाक़ बहुत
उन्हीं को अर्ज़-ए-वफ़ा ना-गवार गुज़री है
सय्यद आबिद अली आबिद
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ग़ज़ल
बिना-ए-अर्ज़-ओ-फ़लक हर्फ़-ए-इब्तिदा हूँ मैं
बिखर गया तो समझ लो कि इंतिहा हूँ मैं
अब्दुल्लाह कमाल
ग़ज़ल
हैं जितनी ख़ूबसूरत उतनी ही हैं बेवफ़ा देखो
'सदा' बस दूर ही से इन हसीनों की अदा देखो
सदा अम्बालवी
नज़्म
वक़्त की चीज़
सब जिसे इंतिहा कहें तू उसे इब्तिदा समझ
हो न इसी समझ पे ख़ुश यूँही बढ़ाए जा समझ
अली मंज़ूर हैदराबादी
ग़ज़ल
ये अर्ज़-ए-शौक़ है आराइश-ए-बयाँ भी तो हो
अदा-शनास तो है आँख ख़ूँ-चकाँ भी तो हो

