aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aamna"
अम्न शहज़ादी
born.1999
शायर
अना देहलवी
असना बद्र
born.1971
अम्न लख़नवी
1898 - 1983
आमिना मुफ़्ती
आमिना अज़फर
अमिना रौशनी रिशा
नफ़ीसा सुल्ताना अंना
आमना अबुल हसन
प्रेमी रूमानी
born.1953
डॉ. श्वेता सिंह उमा
मंजु कछावा अना
born.1973
अतीया परवीन बिलग्रामी
लेखक
आमिना अबुल हसन
1941 - 2005
अम्न इक़बाल
born.2000
इक वही लापता नहीं होताजिस को अपना पता नहीं होता
एक साए से रोज़ होता हैआमना-सामना मकानों में
ख़ुदा का महबूब ख़ुद मोहम्मद हिजाज़ का चाँद रहमत-ए-हक़मिला है मक्के के संग-रेज़ो से आमना तुझ को लाल कैसा
आमना और हव्वा है तूये धरती ये दुनिया तुझ से
इतना पहरा है मेरी आँखों परमैं कोई ख़्वाब देखता ही नहीं
आईने को मौज़ू बनाने वाली ये शायरी पहले ही मरहले में आप को हैरान कर देगी। आप देखेंगे कि सिर्फ़ चेहरा देखने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला आईना शायरी में आ कर मानी कितनी वसी और रंगा-रंग दुनिया तक पहुँचने का ज़रिया बन गया और महबूब से जुड़े हुए मौज़ूआत के बयान में इस की अलामती हैसियत कितनी अहम हो गई है। यक़ीनन आप आज आईने के सामने नहीं बल्कि इस शायरी के सामने हैरान होंगे जो आईना को मौज़ू बनाती है।
अमना اَمْنا
رک: اَم جانا .
अपना اَپنا
(वाहिद ग़ायब के लिए)ख़ुद का, इस का
अना اَنا
अरबी भाषा का सर्वनाम, उर्दू में अधिकांश अरबी के यौगिक शब्दों में प्रयुक्त
'अना عَنا
अ. स्त्री. कष्ट, दुःख, तकलीफ़, प्रयास, मशक्कत
अामना का लाल
राशिदुल ख़ैरी
जीवनीपरक
Mohammad S.A.W.Aagosh-e-Aamna Se Gar-e-Hara Tak
अली असग़र चौधरी
इस्लामियात
Shahkar-e-Qadeem
आमना ख़ातून
ख़ाका: इतिहास एवं समीक्षा
Siyah Surkh Safed
नॉवेल / उपन्यास
Urdu Imla
रशीद हसन ख़ाँ
भाषा
Anna Karenina
लेव तालस्तोय
Aaina-e-Amliyat
मोहम्मद अज़ीज़ुर्रहमान
उर्दू इमला और रस्म-उल-ख़त
फ़रमान फ़तेहपुरी
Apna To Mile Koi
देवमणि पांडेय
ग़ज़ल
जंग और अम्न
उर्दू इमला-ओ-क़वाइद
Apna Gareban Chaak
जावेद इक़बाल
आत्मकथा
उर्दू इम्ला-ओ-रुमूज़-ए-औक़ाफ़
गौहर नौशाही
Aaina-e-Aurangzeb
सय्यद ज़िल्लुर्रहमान
भारत का इतिहास
Islah-e-Talaffuz Wa Imla
तालिब अल-हाश्मी
भीक दो आमना के दुलारेइक भिकारी है दामन पसारे
महक को कभी अपना कर्तब दिखातीकभी बेबी नन्ना को पोयम सुनाती
आमना-सामना तो होता हैउन से कब टोक-टाक होती है
आमना सामना नहीं होताफ़ोन पर रोज़ बात होती है
तुम से कोई गिला नहीं होताहम को अपना कहा नहीं होता
मुझ से बचना कि तेरा मेरा कहींआमना-सामना न हो जाए
वो मुख़ातिब ज़रूर होते हैंआमना-सामना नहीं करते
'अक्स दर 'अक्स कब वो महकेंगेआइना कब गुलाब होना है
ख़ालिक़-ए-अकबर ने तैबा को किया दारुश्शिफ़ाआमना के लाडले जब दाख़िल-ए-तैबा हुए
ज़िंदगी वो सफ़ेद फूल है जिसेएक दोस्त दूसरे दोस्त को पेश करता है
वो जिस के नाम-ए-नामी से लर्ज़ां थी क़ैसरीवो आमना का लाल है दुर्र-ए-यतीम है
दुनिया की ज़ुल्मतों में ये फैली हुई चमकऐ आमना के नूर-ए-नज़र आप ही से है
सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस कीजो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं
चबा लें क्यों न ख़ुद ही अपना ढाँचातुम्हें रातिब मुहय्या क्यों करें हम
न इतनी बे-तकल्लुफ़ीकि आइना हया करे
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