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शेर
न रो इतना पराए वास्ते ऐ दीदा-ए-गिर्यां
किसी का कुछ नहीं जाता तिरी बीनाई जाती है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
मख़मूर सईदी
ग़ज़ल
ऐ दीदा-ए-गिर्यां क्या कहिए इस प्यार-भरे अफ़्साने को
इक शम्अ' जली बुझने के लिए इक फूल खिला मुरझाने को



