aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aish-e-javaa.n"
है जबीं ख़ाक पे और 'अर्श-ए-मु'अल्ला पे दिमाग़नक़्शा आँखों में तिरे दर का खिंचा होता है
आँखों को तमन्ना है ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ कीख़ाक-ए-दर-ए-हर-कूचा इक्सीर नहीं होती
कुछ ऐसे की है अदा रस्म-ए-बंदगी मैं नेगुज़ार दी तिरे वा'दे पे ज़िंदगी मैं ने
है 'ऐश' साथ कोई राहबर न हमराहीकटेगी देखिए तन्हा रह-ए-वफ़ा कैसे
ताब-ए-नज़ारा-ए-रुख़-ए-अनवर नहीं उसेसूरज की सम्त रुख़ है गुल-ए-आफ़्ताब का
बीसवीं सदी का आरम्भिक दौर पूरे विश्व के लिए घटनाओं से परिपूर्ण समय था और विशेष तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप के लिए यह एक बड़े बदलाव का युग था। नए युग की शुरुआत ने नई विचारधाराओं के लिए ज़मीन तैयार की और पश्चिम की विस्तारवादी आकांछाओं को गहरा आघात पहुँचाया। इन परिस्थितियों ने उर्दू शायरी की विषयवस्तु और मुहावरे भी पूरी तरह बदल दिए और इस बदलाव की अगुआई का श्रेय निस्संदेह अल्लामा इक़बाल को जाता है। उन्होंने पाठकों में अपने तेवर, प्रतीकों, बिम्बों, उपमाओं, पात्रों और इस्लामी इतिहास की विभूतियों के माध्यम से नए और प्रगतिशील विचारों की ऎसी ज्योति जगाई जिसने सब को आश्चर्यचकित कर दिया। उनकी शायरी की विश्व स्तर पर सराहना हुई साथ ही उन्हें विवादों में भी घसीटा गया। उन्हें पाठकों ने एक महान शायर के तौर पर पूरा - पूरा सम्मान दिया और उनकी शायरी पर भी बहुत कुछ लिखा गया है। उन्होंने बच्चों के लिए भी लिखा है और यहां भी उन्हें किसी से कमतर नहीं कहा जा सकता। 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' और 'लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी' जैसी उनकी ग़ज़लों - नज़्मों की पंक्तियाँ आज भी अपनी चमक बरक़रार रखे हुए हैं। यहां हम इक़बाल के २० चुनिंदा अशआर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। अगर आप हमारे चयन को समृद्ध करने में हमारी मदद करना चाहें तो आपका रेख्ता पर स्वागत है।
उम्र का वह हिस्सा जो उमंगों, आरज़ुओं और रंगीनियों से भरा होता है, जवानी है। जज़्बों की आंच से चट्टानों को भी पिघला देने का यक़ीन इस उम्र में सब से ज़ियादा होता है। चाहने और चाहे जाने के ख़्वाबों में डूबे रहने की यह उम्र शायरी के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। इस उम्र का नशा किस शायर के कलाम में नहीं मिलता जवानी शायरी पूरे हुस्न और शबाब के साथ आपकी निगाह-ए-करम की मुन्तज़िर हैः
Asr-e-Jadeed Ka Challenge Aur Uska Jawab
अबुल हसन अली नदवी
व्याख्यान
Tareekh-e-Cheen-o-Japan
लार्ड एलजन
इतिहास
Aah-e-Tarab
इशरत जहाँ तरब
काव्य संग्रह
Chota Jam-e-Jahan Numa
Jadeed Urdu Afsane Ka Tanqidi Mutala
डॉ. सय्यदा मुंशाद जहाँ रिज़वी
महिलाओं की रचनाएँ
Tareekh-e-Jahan Gushay of Juwayni
अता मालिक जुवैनी
विश्व इतिहास
Marghub-e-Jahan
सय्यद तजम्मुल हुसैन ख़ान
दीवान
जाम-ए-जहॉं नुमा
बाबू शिव प्रसाद
भूगोल / ज्योग्राफी
Jam-e-Jahan Numa
विलियम एडवर्ड्स
Fatwa-e-Jawaz Ya Shaikh Abdul Qadir Jeelani
माैलाना रशीद अहमद गंगोही
मुंशी नवल किशोर के प्रकाशन
जाम-ए-जहान नुमा
Sham-e-Jawani
जोर्ज विलियम रिनाल्ड
नॉवेल / उपन्यास
जाम-ए-जहाँ नुमा
ग़ैरों की तरह मुँह तकते रहे हर एक का हम इस महफ़िल मेंआँखों में छलक आए आँसू फिर ज़ब्त का यारा हो न सका
न मिलने पर भी उसे 'ऐश' प्यार करता हूँयूँ ऊँचा कर दिया मेआ'र-ए-ज़िंदगी मैं ने
कैसी उजड़ी है ये महफ़िल 'ऐश' हंगाम-ए-सहरशम-ए-कुश्ता है कहीं और ख़ाक-ए-परवाना कहीं
ये नाले वो हैं याद रहे तू न गर मिलापहुँचेंगे ता-ब अर्श-ए-बरीं तेरे वास्ते
बहुत है ख़ेमा-ए-गर्दूं के फूँकने को तो 'ऐश'इस आह-ए-तुफ़्ता जिगर में असर हज़ार न हो
जो होता आह तिरी आह-ए-बे-असर में असरतो कुछ तो होता दिल-ए-शोख़-ए-फ़ित्नागर में असर
रहम ऐ चश्म बनाया है कहीं क्या दिल कोक़तरा-ए-अश्क हो मिज़्गाँ से टपकने के लिए
काम-ए-जानाँ मेरा लब-ए-यार के बोसे से सिवाख़ू-गर-ए-चाशनी-ए-लज़्ज़त-ए-दुश्नाम भी है
ख़ाक छानी जहान की लेकिनदिल-ए-गुम-गश्ता का पता ही नहीं
वाइज़ो बंदा-ए-ख़ुदा तो है 'ऐश'हम ने माना वो पारसा न सही
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