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ग़ज़ल
वो रह-ओ-रस्म न वो रब्त-ए-निहाँ बाक़ी है
फिर भी इस दिल को मोहब्बत का गुमाँ बाक़ी है
राम कृष्ण मुज़्तर
ग़ज़ल
शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो
चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
बे-ख़बर है अपने अंदाज़-ए-दिल-आराई से हुस्न
क्यों न उस को इश्क़ से भी बढ़ के दीवाना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
अब हसीं चेहरों पे मिलती है तसन्नो की नक़ाब
ग़म्ज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अंदाज़-ओ-अदा कुछ भी नहीं