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ग़ज़ल
अब आगे किस से लिक्खा जाए आग़ाज़-ए-मोहब्बत पर
फ़साना ख़त्म कर देते हैं अरबाब-ए-क़लम मेरा
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
अब इस से बढ़ के फ़िक्र-ओ-ज़ेहन की तौहीन क्या होगी
कि अरबाब-ए-क़लम अपने क़लम तक बेच देते हैं
मैकश बदायुनी
ग़ज़ल
जब से बाज़ार में बिकने लगे फ़नकार 'नियाज़'
मुझ से अरबाब-ए-क़लम शहर में कम आते हैं
नियाज़ सुल्तानपुरी
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ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
ज़ब्त इतना कि चराग़ों से हुए महव-ए-कलाम
याद इतनी कि तुझे दिल से उतरने न दिया
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
जाने किस का हाशिया-बरदार है मेरा क़लम
हर कस-ओ-ना-कस की इस ने तर्जुमानी छोड़ दी
