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ग़ज़ल
जब से बाज़ार में बिकने लगे फ़नकार 'नियाज़'
मुझ से अरबाब-ए-क़लम शहर में कम आते हैं
नियाज़ सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
अब आगे किस से लिक्खा जाए आग़ाज़-ए-मोहब्बत पर
फ़साना ख़त्म कर देते हैं अरबाब-ए-क़लम मेरा
फ़ानी बदायुनी
समस्त
