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ग़ज़ल
इस ‘अक़ीदे ने लिया क़ैसर-ओ-किसरा से ख़िराज
मौत का वक़्त अज़ल से है मुक़र्रर देखो
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
बे-अमल लोगों से जब पूछो तो कहते हैं की 'शान'
हम अज़ल से क़िस्मत-ए-नाकाम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
दिल-आशोब
यूँ कहने को राहें मुल्क-ए-वफ़ा की उजाल गया
इक धुँद मिली जिस राह में पैक-ए-ख़याल गया
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
बहादुर-शाह-'ज़फ़र' की याद में
मिरे चमन में उरूस-ए-बहार-ए-आज़ादी
तिरे मज़ार पे आँसू बहा के आई है
रविश सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
उरूस-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद मिल ही जाएगी इक दिन
यूँही चंदे रहा गरजा वो पैमा कारवाँ अपना
आसी रामनगरी
ग़ज़ल
सुना है अहद-ए-गुज़िश्ता के फ़र्द फ़र्द का ज़ेहन
उरूस-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र का निगार-ख़ाना था
रहबर ताबानी दरियाबादी
ग़ज़ल
चेहरा खोले नज़र आती थी उरूस-ए-गुल-नार
मुँह पे शबनम की रिदा है मुझे मा'लूम न था
सय्यद आबिद अली आबिद
नज़्म
उलमा-ए-ज़िंदानी
शहीदान-ए-वफ़ा के क़तरा-ए-ख़ूँ काम आएँगे
उरूस-ए-मस्जिद-ए-ज़ेबा को अफ़्शाँ की ज़रूरत है