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ग़ज़ल
उड़ता है शौक़-ए-राहत-ए-मंज़िल से अस्प-ए-उम्र
महमेज़ कहते हैंगे किसे ताज़ियाना क्या
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
बार-हा जी में ये आई उम्र-ए-रफ़्ता से कहूँ
शाम होने को है ऐ भूले मुसाफ़िर घर तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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रेख़्ता शब्दकोश
ruuh-e-asr
रूह-ए-अस्रرُوحِ عَصْر
ज़माना की रूह , (फ़लसफ़ा-ए-तारीख़) किसी दौर का वो ग़ालिब रुजहान जो इलमी सरगर्मीयों और अदबी तख़लीक़ात में एक मूसिर आमिल के तौर पर सराएत कर जाता है
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ग़ज़ल
हम-नफ़स-ओ-हबीब-ए-ख़ास बनते हैं ग़ैर किस तरह
बोली ये सर्द-मेहरी-ए-उम्र-ए-गुरेज़-पा कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
इक इम्तिहान-ए-वफ़ा है ये उम्र भर का अज़ाब
खड़ा न रहता अगर ज़लज़लों में क्या करता
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ऐ मिरी उम्र के मा'ज़ूर गुज़रते लम्हो
तुम ने जाते हुए मुड़ कर कभी देखा भी नहीं
