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ग़ज़ल
हुसूल-ए-ग़म ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर कुछ और होता है
दिल-ए-बर्बाद का अज़्म-ए-सफ़र कुछ और होता है
जलील इलाहाबादी
ग़ज़ल
ख़त के बदले उन्हें कुछ फूल पहुँच जाते हैं
मेरी तहरीर ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर जाती है
हादी मुस्तफाबादी
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ba-alfaaz-e-diigar
ब-अल्फ़ाज़-ए-दीगरبَاَلْفاظِ دِیگَر
ba-alfaaz-e-diigar
ब-अल्फ़ाज़-ए-दीगरبَہ اَلفاظِ دِیگَر
दूसरे शब्दों में, वही बात दूसरे तरीक़े से
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ग़ज़ल
मिरे सीने में तेरे तीर का पैकान बाक़ी है
ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर रूदाद का उन्वान बाक़ी है
अज़ीज़ वारसी
ग़ज़ल
जो बुज़ुर्गों ने सुनाए और थक कर सो गए
मैं वही क़िस्से ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर कहता रहा
मिद्हत-उल-अख़्तर
नज़्म
मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ से ख़िताब
लेकिन ऐ इल्म-ओ-जसारत के दरख़्शाँ आफ़्ताब
कुछ ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर भी तुझ से करना है ख़िताब
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
बुझी हसरत का नौहा है दिल-ए-मरहूम का मातम
ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर ये शेर-ख़्वानी सोज़-ख़्वानी है