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ग़ज़ल
खरी बातें ब-अंदाज़-ए-सुख़न कह दूँ तो क्या होगा
अदू-ए-जान-ओ-तन को जान-ए-मन कह दूँ तो क्या होगा
शाद आरफ़ी
ग़ज़ल
चाक सीने का ब-अंदाज़-ए-जिगर हो कि न हो
और फिर लज़्ज़त-ए-जाँ ज़ौक़-ए-असर हो कि न हो
कैफ़ी चिरय्याकोटी
ग़ज़ल
जज़्बा-ए-इश्क़ बहुत ख़ाक उड़ाता है मगर
कू-ए-जानाँ में ब-अंदाज़-ए-सुकूँ दौड़ता है
सुल्तान अख़्तर
नज़्म
शाम-ए-हिलाल-ए-ईद
चाँद निकला है ब-अंदाज़-ए-दिगर आज की शाम
बारिश-ए-नूर है ता-हद्द-ए-नज़र आज की शाम
अरमान अकबराबादी
ग़ज़ल
ब-अंदाज़-ए-दिगर अब 'अहद-ओ-पैमाँ होते जाते हैं
किसी 'उनवाँ सही जीने के सामाँ होते जाते हैं
