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नज़्म
फ़र्ज़ करो
फ़र्ज़ करो ये जोग बजोग का हम ने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
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नज़्म
ज़वाल-ए-अहद-ए-तमन्ना
हवा में उड़ता है काजल फ़ज़ा है हुज़्न से बोझल
हर एक कुंज की हलचल कोहर में डूब चली है
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
ग़ज़ल
बे-धड़क 'जोश' वो बढ़ते रहे मंज़िल की तरफ़
क़ाफ़िले वालों ने सोची नहीं अंजाम की बात
ज़ुबैर बहादुर जोश
ग़ज़ल
ख़ुश-नुमा या बद-नुमा हो दहर की हर चीज़ में
'जोश' की तख़्ईल कहती है कि नुदरत देखिए
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
बना देंगी यक़ीं है 'जोश' मर्द-ए-बा-ख़ुदा इक दिन
तपिश-अंदोज़ियाँ सीने में बर्क़-ए-सोज़-ए-पिन्हाँ की
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
रगों से ख़ून सारा ज़हर बन कर फूट निकलेगा
ज़रा ऐ 'जोश' ज़ब्त-ए-शौक़ से हुश्यार हो जाना
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
मुझ से साक़ी ने कही रात को क्या बात ऐ 'जोश'
यानी अज़दाद हैं परवरदा-ए-यक-ज़ात ऐ 'जोश'