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ग़ज़ल
मुतरिबो बा-साज़ आओ तुम हमारी बज़्म में
साज़-ओ-सामाँ से तुम्हारी इतनी साज़िश और है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
जो अव्वल ओ आख़िर था वो अव्वल ओ आख़िर है
मैं नाला-ब-जाँ उठता वो नग़्मा-ब-साज़ आती
असरार-उल-हक़ मजाज़
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