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नज़्म
मोहब्बत में ख़ुदा भी मुब्तला है
मोहब्बत बाइ'स-ए-अर्ज़-ओ-समा है
मोहब्बत में ख़ुदा भी मुब्तला है
नईम जर्रार अहमद
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ग़ज़ल
रौनक़-ए-अर्ज़-ओ-समा शम्स ओ क़मर मैं ही हूँ
ग़ौर से देखिए ता-हद्द-ए-नज़र मैं ही हूँ
मुज़फ़्फ़र अबदाली
नज़्म
हम्द गाती है ज़मीं
क्यों मगर इंसान अपने रब से ग़ाफ़िल है यहाँ
मालिक-ए-अर्ज़-ओ-समा को याद करता है जहाँ
मोहम्मद असदुल्लाह
कुल्लियात
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
वुसअ'त मिरे ख़याल में अर्ज़-ओ-समा की है
महरम नज़र मिरी हरम-ए-किब्रिया की है
रसूल जहाँ बेगम मख़फ़ी बदायूनी
ग़ज़ल
इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़-ओ-समा दे दूँगा
तुझ से काफ़िर को तो मैं अपना ख़ुदा दे दूँगा




