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ग़ज़ल
जब उठा ख़ंजर न उस से इस अदा पर मर गए
हम से भी गोया न बार-ए-मिन्नत-ए-क़ातिल उठा
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
रहीन-ए-मिन्नत-ओ-एहसान-ए-यार मैं भी हूँ
फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-फ़स्ल-ए-बहार मैं भी हूँ
अख़्तर ग्वालियारी
ग़ज़ल
है मिरा सर ज़ेर-ए-बार-ए-मिन्नत-ए-बेदाद-ए-यार
उस के अल्ताफ़-ओ-इनायत का मैं क़ाएल हो गया
महाराजा सर किशन परसाद शाद
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ग़ज़ल
बार-हा जी में ये आई उम्र-ए-रफ़्ता से कहूँ
शाम होने को है ऐ भूले मुसाफ़िर घर तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ज़िंदगी के नर्म काँधों पर लिए फिरते हैं हम
ग़म का जो बार-ए-गिराँ इनआम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
देख लेना पस-ए-क़ातिल भी कोई होगा ज़रूर
सिर्फ़ क़ातिल ही चलाता नहीं ख़ंजर देखो
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
दस्त-ए-क़ातिल में कोई तेग़ न ख़ंजर होता
मिरा साया जो मिरे क़द के बराबर होता


