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ग़ज़ल
जो हो बारान-ए-रहमत मज़रआ-ए-अग़्यार के हक़ में
वही बर्क़-ए-ग़ज़ब हो आह हक़ में मेरे ख़िर्मन के
रंजूर अज़ीमाबादी
नज़्म
ख़ुश्क-साली
जब ये आलम है तो बारिश की शिकायत किस लिए
बे-महल ये हसरत-ए-बारान-ए-रहमत किस लिए
जोश मलीहाबादी
नज़्म
बस का सफ़र
बसों की छत पे लद कर दूध के बर्तन जो आते हैं
सरों पर शीर का बारान-ए-रहमत वो गिराते हैं
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
ग़ज़ल
सोच रहा था ग़म-नसीब बिगड़ी बने तो किस तरह
रहमत-ओ-लुत्फ़-ए-किर्दगार बन गए आसरा कि यूँ
एस ए मेहदी
शेर
सुना किस ने हाल मेरा कि जूँ अब्र वो न रोया
रखे है मगर ये क़िस्सा असर-ए-दुआ-ए-बाराँ
बन्द्र इब्न-ए-राक़िम
कुल्लियात
तड़प कर गर्म टुक जूँ बर्क़ ठंडे होते जाते हैं
बसान-ए-अब्र-ए-रहमत रो बहुत हम बे-क़रारों पर