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ग़ज़ल
दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी
इश्क़ ना-पुख़्ता अभी जज़्ब-ए-दरूँ ख़ाम अभी
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ख़्वाब-ए-सहर
इक न इक मज़हब की सई-ए-ख़ाम भी होती रही
अहल-ए-दिल पर बारिश-ए-इल्हाम भी होती रही
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
तकते हैं फ़र्श-ए-नुत्क़ से 'अर्श-ए-ख़याल को
मुद्दत हुई कि बारिश-ए-इल्हाम भी नहीं
रियासत अली असरार
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ग़ज़ल
जिन पे बारिश-ए-गुल है उन का हाल क्या होगा
ज़ख़्म खाने वाले भी बाग़ बाग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
बारिश-ए-संग-ए-अलम अपना मुक़द्दर ठहरी
राहत-ए-दर्द मिली लुत्फ़-ओ-करम के बदले
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
गौरय्यों ने जश्न मनाया मेरे आँगन बारिश का
बैठे बैठे आ गई नींद इसरार था ये किसी ख़्वाहिश का
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
दो अश्क जाने किस लिए पलकों पे आ कर टिक गए
अल्ताफ़ की बारिश तिरी इकराम का दरिया तिरा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
शाइ'र से ख़िताब
जब न खेले जल्वतों में शाहिद-ए-इल्हाम से
जब हरीम-ए-नाज़ के पर्दे उठा सकते नहीं
सरीर काबिरी
नज़्म
नुक्ता-फ़रसाई
ख़्वाजा-ए-कौनैन की चश्म-ए-करम के फ़ैज़ से
मेरा हर हर शे'र 'शोरिश' पारा-ए-इल्हाम है
शोरिश काश्मीरी
ग़ज़ल
इस ज़माने में भी इल्हाम है 'मंज़ूर' का शे'र
मैं किसी दौर में हसरत-कश-ए-इल्हाम न था