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ग़ज़ल
जब कहा मैं ने कि मर मर के बचे हिज्र में हम
हँस के बोले तुम्हें जीना था तो मर क्यूँ न गए
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
कुछ नहीं खुलता किस की ज़द में ये हस्ती-ए-गुरेज़ाँ है
हम जो इतने बचे फिरते हैं किन तीरों के निशाने हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बचे किस तरह से मरीज़-ए-ग़म न तुम आ सको न बुला सको
यही हालतें हैं तो देखना कोई दम में क़िस्सा तमाम है
