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हिंदी ग़ज़ल
जिएँ तो अपने बग़ैचा में गुल-मुहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुल-मुहर के लिए
दुष्यंत कुमार
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ग़ज़ल
जब से देखा है तिरे चेहरे को इस शहर के लोग!
फूल बाग़ीचा ओ गुल-दान कहाँ देखते हैं
राना आमिर लियाक़त
ग़ज़ल
नज़र उन से ये संडे को बाग़ीचे में मिली ऐसी
कि अब हफ़्ते के हर दिन को मुझे इतवार करना है
आनंद वर्मा
ग़ज़ल
तेरी नीली चुनरी ने क्या हाल किया बाग़ीचे का
नारंगी फूलों वाला गुल-मोहर नीला नीला है

