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ग़ज़ल
दम से यूसुफ़ के जब आबाद था याक़ूब का घर
चर्ख़ कहता था कि ये बैत-ए-हुज़न किस का है
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
अदल-ए-जहाँगीरी
नख़वा-ए-हुस्न से बेगम ने ब-सद-नाज़ कहा
मेरी जानिब से करो अर्ज़ ब-आईन-ए-हसन
शिबली नोमानी
ग़ज़ल
चमन में कलियाँ हैं रंजीदा और खौफ़ज़दा
मलाल-ओ-हुज़्न भी फूलों के रंग-ओ-बू में रहा
शकील अहमद शकील
ग़ज़ल
मेहरबानी की तरह पहली न भूलो यक-ब-यक
बैत-ए-अबरू कूँ तुम अपनी ताज़ा मज़मूँ मत करो
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
महका हुआ है बैत-ए-हुज़न देखना कोई
आया नसीम-ए-मिस्र का हो कारवाँ नहीं
मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
ग़ज़ल
बैत-ए-अबरू पे नए तिल में ये मज़मूँ है और
चढ़ गए रात किसी शाइ'र-ए-मय-ख़्वार के हाथ