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शेर
बुरा मत मान इतना हौसला अच्छा नहीं लगता
ये उठते बैठते ज़िक्र-ए-वफ़ा अच्छा नहीं लगता
आशुफ़्ता चंगेज़ी
ग़ज़ल
बुरा मत मान इतना हौसला अच्छा नहीं लगता
ये उठते बैठते ज़िक्र-ए-वफ़ा अच्छा नहीं लगता
आशुफ़्ता चंगेज़ी
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नज़्म
शाम-ए-अयादत
निकलते बैठते दिनों की आहटें निगाह में
रसीले होंट फ़स्ल-ए-गुल की दास्ताँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
चंद शाइ'र हैं जो इस शहर में मिल बैठते हैं
वर्ना लोगों में वो नफ़रत है कि दिल बैठते हैं
जावेद अहमद
नज़्म
ऐ मतवालो! नाक़ों वालो!!
क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँ बीमार हुआ
उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
करे है कुछ से कुछ तासीर-ए-सोहबत साफ़ तबओं की
हुई आतिश से गुल की बैठते रश्क-ए-शरर शबनम