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नज़्म
होली की बहारें
भड़वे भी, भड़वा बकते हों तब देख बहारें होली की
और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवय्यों के लड़के
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दावा-ए-मज्ज़ूबियत क्या मुझ से करे मंसूर 'वफ़ा'
बक उठना है सहल मगर बकते जाना सहल नहीं
मेला राम वफ़ा
ग़ज़ल
हर वक़्त मियाँ ख़ूब नहीं गालियाँ देनी
क्या बकते हो तुम यावा ज़बाँ अपनी सँभालो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
नसीहत है अबस नासेह बयाँ नाहक़ ही बकते हैं
जो बहके दुख़्त-ए-रज़ से हैं वो कब इन से बहकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
बातों बातों में जो हम ने दर्द दिल का भी कहा
सुन के बोला तू ने ये क्या बकते बिकते कह दिया
नज़ीर अकबराबादी
कुल्लियात
'मीर' को वहशत हैगी क़यामत वाही-तबाही बकते हैं
हर्फ़-ओ-हिकायत क्या मजनूँ की दिल में कुछ मत लाओ तुम
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
बावले से जब तलक बकते थे सब करते थे प्यार
'अक़्ल की बातें कियाँ क्या हम से नादानी हुई
मीर तक़ी मीर
हास्य
बकते हैं 'अक़ीदत में जो दिल में समाता है
गो कुछ भी नहीं सर में है मुँह में ज़बाँ आख़िर
असरार जामई
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले
दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं
