मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

MORE BY फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    INTERESTING FACT

    With this poem, Faiz’s focus changes from traditional Urdu poetry to “poetry with purpose”, poetry with social conscience pursuing social causes. And Faiz admitted it, before the start of this poem, with a quote from a Persian poet, Nizami: “Dil-e-bufro-khatm, jaan-e-khareedun” ( “I have sold my heart and bought a soul”)

    मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब माँग

    मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात

    तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है

    तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात

    तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

    तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए

    यूँ था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए

    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

    Do Not Ask of Me, My Love

    अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म

    रेशम अतलस कमख़ाब में बुनवाए हुए

    जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म

    ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

    Do not ask of me, my love,

    that love I once had for you.

    There was a time when

    life was bright and young and blooming,

    and your sorrow was much more than

    any other pain.

    Your beauty gave the spring everlasting youth;

    your eyes, yes your eyes were everything,

    all else was vain.

    While you were mine, I thought, the word was mine.

    Though now I know that it was not reality,

    that's the way I imagined it to be;

    for there are other sorrow in the world than love,

    and other pleasures, too.

    Woven in silk and stain and brocade,

    those dark and brutal curses of countless centuries:

    bodies bathed in blood, smeared with dust,

    sold from market-place to market-place,

    bodies risen from the cauldron of disease

    pus dripping from their festering sores-

    my eyes must also turn to these,

    You're beautiful still, my love

    but I am helpless too;

    for there are other sorrow in the world than love,

    and other pleasures too.

    Do not ask of me, my love,

    the love I once had for you!

    जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से

    पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से

    लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे

    अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

    मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब माँग

    वीडियो
    This video is playing from YouTube

    Videos
    This video is playing from YouTube

    नूर जहाँ

    नूर जहाँ

    सीमा सहगल

    सीमा सहगल

    ज़ोहरा सहगल

    ज़ोहरा सहगल

    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    अज्ञात

    अज्ञात

    राधिका चोपड़ा

    राधिका चोपड़ा

    शबनम मजीद

    शबनम मजीद

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    फरीहा परवेज़

    फरीहा परवेज़

    रजनी पल्लवी

    रजनी पल्लवी

    आसिफ़ रज़ा

    आसिफ़ रज़ा

    अज्ञात

    अज्ञात

    टीना सानी

    टीना सानी

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    अज्ञात

    बुशरा सादिक

    बुशरा सादिक

    RECITATIONS

    नूर जहाँ

    नूर जहाँ

    फ़हद हुसैन

    फ़हद हुसैन

    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    नूर जहाँ

    मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग नूर जहाँ

    स्रोत:

    • Book: Nuskha Hai Wafa (Pg. 61)

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY

    Added to your favorites

    Removed from your favorites